09/08/2023
सायकल के डंडे पर बैठकर स्कूल जाता था।
रामदेव चौकीदार स्कूल छोड़कर आता, लेने भी जाया करता था। कुछ दिन रिक्शे में भी स्कूल गया। मन होता कि खुद की सायकल होती, कितना अच्छा होता।
सात वी कक्षा में आया, तो 19 इंच की खूबसूरत BSA SLR लाल सायकल चाचा की चलाने को मिल जाती थी। पता नही, मन की पढ़ ली थी क्या ऊपर वाले ने??
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तीन चार साल में हम बड़े हुए, सायकल भी बड़ी हो गयी। दसवीं तक आ चुके थे। भईया पंत नगर से चेन्नई चले गए, तो घर में इकलौता बच्चा था सो पापा की बजाज सुपर हाथ लगी। खूब चलाया। टांग पर टांग रखकर यूँ चलाते जैसे बादशाह सिंहासन में
मगर बड़ा होने का एक ही इम्पोर्टेन्ट सिंबल था।।
पापाजी की स्कूटर चलाना।
पांचवी छठवीं से ही, बजाज सुपर अप52,6662 पोंछता था। पापाजी खुश होकर एक रुपया देते। उसके पहले दादा जी के जूते पॉलिश करता था। ऐसी कोई बाध्यता न थी। करने वाले नौकर मौजूद थे, मगर ये मेरा उनके प्रति संम्मान था।
और अठन्नी का लालच भी।
और चुकी दादा जी बहुत बड़े पत्रकार थे तो
जिस दिन स्कूल नही जाता टेलीफोन 2148 रिसीव करने की ड्यूटी अलग से कमाई 2 रुपया शाम को बाबा देते थे, पवन की दूकान फेवरेट थी सो दौड़ पड़ते थे पैसा पाते ही,
सुबह रामजी की रेलवे स्टेशन पे जलेबी पूरी और स्कूल की तैयारी
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बहरहाल जब स्कूटर भी चमकाने लगा तो इंक्रीमेंट हो गया। अठन्नी रुपये में बदली, और खुद ही 2 और 5 रुपये में।
जब स्कूटर चलाने लगा, 16 रुपये का पेट्रोल आता था। "तेल डला लेना" कहकर, हर दूसरे दिन 20 रुपये मिलते। तेल 10 का डलवाता, बाकी बचा लेता। सब्जी वब्जी खरीदकर लाने काम मिलता, तो उसमे भी दो चार रुपये का मुनाफा होता। जेब मे इतने रुपये होते की याने इतना रईस तो मैं जीवन मे फिर कभी न हुआ।
कॉमिक्स का शौक था, खूब किराये पर लाता था। फिर दूजी किताबे खरीदने लगा, नॉवेल्स, साहित्य, बकवास सब। कमरे में दुनिया जहान के विषयों और बुक्स भरने लगी। फिर संगीत का शौक चढ़ा तो कैसेट्स में, सीरियस इन्वेस्ट किया।
फिल्मी, जगजीत, दीगर गजलें, पॉप और तमाम..
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स्कूटर कभी कभी चलाने को मिलता था। बायें हाथ के खट, खिट, खटाक, खड़क... फोर्थ गियर। जू जूंsss जूंss!! बजाज सुपर का कोई मुकाबला नही।
फीर पापाजी छोटे फूफा को गिफ्ट दे गए, स्कूटर चली गई गयी।
बहुत सम्हाल के चलाता। मगर ऐसा सिर्फ मुझे लगता था, दूसरों को नही। खूब गिरे, ठुके, चोट खाई।
स्कूटर के दिन जादुई थे। बाइक से मुझे नफरत थी। स्कूटर सॉफिस्टिकेटेड लगती, प्यार से भरी। माँ को, दोस्तों को अनूप को, और कई लोग पीछे बिठाकर यहां वहां ले जाता। उनको कहीं भी लेकर जाना, मेरा काम था। बड़ा जिम्मेदारी का काम था।
फिर चाचा की दहेज में स्प्लेंडर आई UP 52D5715
पर स्कूटर की याद जस की तस जेहन में रह गई
बुलेट खरीदी ड्रीम था मेरा UP 52Q 8108
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ड्राइविंग, उसके कुछ बरस बाद, से सीखी। कालेज में खूब जीप किराये से ली जाती है। उसमे एक ड्राइवर को एक शाम ड्राइविंग सिखाने को कहा।
उसने बगल में बिठाया, और गियर समझाए, स्टीयरिंग पकड़ाया, एक हाथ खुद लगाए, इंस्ट्रक्शन देने लगा। मैं कुछ देर में ऊब गया।
उसे जरा दूर बैठाया। फिर मैंने कल्पना की, कि मैं स्कूटर चला रहा हूँ। क्लच, गियर, एक्सीलेटर... सेम फील, सरपट 12-15 किमी ड्राइव किया। सीधा GIC में लाकर खड़ा किया।
ड्राइवर बोला- चौबे जी आपको पहले से आता था, तो मुझे सिखाने को क्यो कह रहे थे??
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कार खरीदा ऑल्टो UP 53Y2135, पर था तो घर का सबसे छोटा।
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पहली गाड़ी ऑल्टो थी, सिल्वर रंग। कार खरीदी, बरसों बाद चारपहिया चलाया, खूब चलाया। फिर दूसरी रिट्ज UP 25AJ5347ली। खूब मस्ती की मैं अनुप, पप्पू, जावेद ये हम चार हमेशा कहीं भी जाने को तैयार ।
फिर स्कार्पियो ली टॉप मॉडल पापा की फेवरेट थी था। इसके अलावे कभी कार नही खरीदा।
12 साल बुलेट से ही चला। 33बाइक, 1स्कूटर ..
और फिर शादी होने के बाद पत्नी लिए स्कूटर खरीदी । एक दिन शौकिया चलाया।
फिर चलाया।
और फिर चलाया।
अब हफ्ते में एकाध बार स्कूटी से फार्म जाने का लुत्फ ले रहा था। खुली हवा, बदन पर सरसराती निकलती है। UP 526662का फील आता है।
पर कुछ मिसिंग है..
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बायें हाथ के खट, खिट, खटाक, खड़क... वन- टू- थ्री, फोर्थ गियर। जू जूंsss जूंss!! बजाज सुपर का कोई मुकाबला नही।
बिना शोर, यह स्कूटी चलती है।
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जी करता है एक स्कूटर खरीद लूँ।
आज olx पर खोजता रहा, मगर कोई जमी नही। सब बिना गियर वाली स्कूटी बिन दांत की शेर, या कहें बकरी सी लगती है।
फिर स्कूटर तो खरीद लोगे ग़ालिब। पोर्च में खड़ी भी हो जाएगी। पर जूते किसके पोलिश करोगे। कपड़ा मारकर गाड़ी किसकी चमकाओगे। अठन्नी कहाँ मिलेगी। कॉमिक्स कहाँ से लाओगे।
तुम दरअसल जो चाह रहे हो,
वो हो नही सकता।
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वो बजाज सुपर, वो हवा, वो टार्क, और बिन पूछे स्कूटर उठा लाने की झुरझुरी, ये चीजें खरीदी नही जाती अभिषेक चतुर्वेदी। ये ईश्वर के द्वारा अवार्ड होती है।
जिंदगी में सिर्फ एक ही बार होती हैं।