24/04/2026
#यह प्रसिद्ध दोहा संत कबीरदास जी द्वारा रचित है, जो जीवन की क्षणभंगुरता, नश्वरता और बिछड़ने के अटूट सत्य को दर्शाता है। इसमें पत्ता वृक्ष से कहता है कि अब जब हम अलग होंगे, तो फिर कभी नहीं मिलेंगे और दूर कहीं चले जाएंगे, ठीक वैसे ही जैसे शरीर और आत्मा के बिछड़ने के बाद पुनर्मिलन असंभव है।
दोहे का अर्थ और संदेश:
मूल अर्थ: जब पत्ता पेड़ से गिरता है, तो वह कहता है- "हे वन के राजा वृक्ष! अब हम अलग हो रहे हैं, तो दोबारा नहीं मिलेंगे। मैं दूर कहीं गिरकर नष्ट हो जाऊँगा"।
भावार्थ: यह दोहा संसार की निस्सारता को दर्शाता है। भौतिक शरीर का रिश्ता भी ऐसा ही है; एक बार टूटने के बाद दोबारा नहीं मिलता।
शिक्षा: यह हमें यह सिखाता है कि सांसारिक रिश्ते अस्थायी हैं, और हमें किसी भी चीज़ से बहुत अधिक मोह नहीं रखना चाहिए क्योंकि बिछड़ना निश्चित है।
यह पंक्तियाँ कबीर ग्रंथावली से ली गई हैं। #