17/02/2026
“मेरे आँख खोलते ही मेरे सामने 9 सुन्दर परियां खड़ी थी जो मुझे अपने साथ ले जाना चाहती थी और मुझसे अपना मन बहलाना चाहती थी….”
हिमालय की अनंत चोटियों के बीच, जहाँ बादल पहाड़ों के चरणों में विश्राम करते हैं और देवदार के घने जंगल सदियों पुराने रहस्यों को अपनी गोद में छुपाए रखते हैं, वहाँ स्थित है—'खैट पर्वत'।
उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल क्षेत्र का यह पर्वत कोई साधारण चोटी नहीं है। स्थानीय लोककथाओं में इसे 'आंचरियों' यानी परियों का देश कहा जाता है। गाँव के बुजुर्ग आज भी अपनी कांपती आवाज़ में चेतावनी देते हैं कि खैत की ये नौ परियाँ पर्वत की रक्षक हैं।
वे जितनी सुंदर हैं, उतनी ही खतरनाक भी। उन्हें शोर-शराबा, चटक रंग और इंसानों की दखलंदाज़ी बिल्कुल पसंद नहीं। कहा जाता है कि यदि कोई गंधर्वों जैसी मधुर तान छेड़े या उनकी एकाग्रता भंग करे, तो ये परियाँ उसे सम्मोहित कर अपने साथ पाताल की गहराई या बादलों के पार ले जाती हैं, जहाँ से आज तक कोई वापस नहीं लौटा।
टिहरी के एक छोटे से गाँव 'बागुड़ी' में रात का सन्नाटा पसरा था। मिट्टी और पत्थर से बने एक पुश्तैनी मकान के आँगन में आग जल रही थी।
आग की लपटों के इर्द-गिर्द दो भाई बैठे थे—बिरजू और देवा। 25 वर्षीय बिरजू अपनी लंबी कद-काठी और हंसमुख स्वभाव के लिए पूरे गाँव में प्रसिद्ध था। उसके कंधे चौड़े थे और आँखों में एक अजीब सी बेपरवाही थी। वहीं उसका छोटा भाई, 23 साल का देवा, थोड़ा शांत और गंभीर था।
बचपन में ही पिता की मृत्यु के बाद बिरजू ने ही घर की पूरी ज़िम्मेदारी उठाई थी। वह दिन भर खेतों में पसीना बहाता और शाम को अपनी पसंदीदा बाँसुरी बजाता।
उनकी माँ, जिनके चेहरे की झुर्रियों में संघर्ष की कहानियाँ अंकित थीं, उन्हें खैत पर्वत की कहानी सुना रही थीं। "याद रखना बेटों," माँ ने बुझती आग को कुरेदते हुए कहा, "खैत की सुंदरता एक छलावा है। वहाँ के फूल तुम्हें बुलाएंगे, वहाँ की हवाएँ तुम्हें लोरी सुनाएंगी, पर तुम अपने कदम मत डगमगाना।
जो वहाँ गया, वो फिर कभी मुड़कर नहीं देखा गया।" बिरजू ने एक फीकी हँसी हँस दी और बाँसुरी को साफ़ करते हुए बोला, "माँ, ये सब पुरानी बातें हैं। अब परियाँ कहाँ होती हैं!" देवा ने भाई को टोकना चाहा, पर बिरजू की आँखों की चमक देख चुप रह गया।
अगले दिन सूरज की पहली किरण के साथ ही दोनों भाई गाँव के पंडित जी के पास पहुँचे। पहाड़ी जीवन में खेती ही सब कुछ थी, और इस साल फसल बोने से पहले मुहूर्त जानना ज़रूरी था। पंडित जी ने अपनी पुरानी पोथी खोली, गणना की और गहरी चिंता में डूब गए। "बिरजू, नक्षत्रों की दशा ठीक नहीं है। इस बार भूमि पूजन का कोई मुहूर्त नहीं निकल रहा।"
दोनों भाइयों के चेहरों पर हवाइयाँ उड़ने लगीं। खेती न होने का अर्थ था—भूख। देवा ने हाथ जोड़कर विनती की, "महाराज, कोई तो उपाय होगा? बिना फसल के माँ का ख्याल कैसे रखेंगे?" पंडित जी ने चश्मा ठीक किया और धीमी आवाज़ में कहा, "एक गुप्त विधान है।
तुम्हारी बहन सुमन, जो अपने ससुराल में है, उसे अमावस्या की रात से पहले यहाँ ले आओ। यदि वह अपने पवित्र हाथों से पहली मुट्ठी बीज बोएगी, तो ग्रहों का प्रकोप शांत हो जाएगा और फसल लहलहा उठेगी।"
बिरजू के मन में अचानक एक योजना बिजली की तरह कौंधी। सुमन का ससुराल जिस दिशा में था, उसी रास्ते में ‘रतनाल ' नाम का एक गाँव आता था। रतनाल—जहाँ उसकी प्रेमिका 'धारणा' रहती थी। बिरजू का दिल धड़क उठा। उसने सोचा कि यह तो 'एक पंथ दो काज' वाली बात हो गई।
वह सुमन को लाने के बहाने धारणा से भी मिल लेगा, जिसके बिना उसे एक-एक दिन साल जैसा लग रहा था। उसने तुरंत घोषणा कर दी, "पंडित जी, मैं ही सुमन को लेने जाऊँगा। देवा घर पर माँ का ख्याल रखेगा।"
निकलने का दिन आ पहुँचा। बिरजू ने अपनी सबसे अच्छी कमीज़ पहनी, कंधे पर एक छोटा झोला लटकाया और अपनी बांसुरी कमर में खोंस ली। जैसे ही उसने घर की चौखट के बाहर अपना दायां पैर रखा, पास ही खूंटे से बंधी उसकी काली बकरी ने ज़ोर से 'छींक' दिया।