16/02/2025
मिर्च की 0-100 दिन की कीट एवं रोग प्रबंधन योजना
0-20 दिन (नर्सरी चरण)
इस चरण में मुख्य रूप से फफूंदी जनित रोग और कीटों का प्रकोप देखने को मिलता है।
• डैंपिंग ऑफ (फफूंदी रोग): इसमें पौधों की जड़ सड़ने लगती है और वे मुरझाने लगते हैं। बचाव के लिए बीजोपचार करें कैप्टान 75% WP (2-3 ग्राम/किग्रा बीज) या मेटालैक्सिल 35% WS (1 ग्राम/किग्रा बीज) से।
• थ्रिप्स (Thrips): ये छोटे कीट पत्तियों पर चांदी जैसी धारियां और मुड़ने की समस्या पैदा करते हैं। इसे नियंत्रित करने के लिए फिप्रोनिल 5% SC (1 मि.ली./ली.) या स्पिनोसैड 45% SC (0.3 मि.ली./ली.) का छिड़काव करें।
20-40 दिन (शाकीय वृद्धि चरण)
इस चरण में रस चूसने वाले कीट और फफूंदी जनित रोग ज्यादा प्रभावित करते हैं।
• एफिड्स और सफेद मक्खी: ये कीट शहद जैसी चिपचिपी परत बनाते हैं जिससे पत्तियां मुड़ जाती हैं। इन्हें रोकने के लिए इमिडाक्लोप्रिड 17.8% SL (0.25 मि.ली./ली.) या थायोमेथॉक्साम 25% WG (0.3 ग्राम/ली.) का छिड़काव करें।
• पाउडरी मिल्ड्यू (चूर्णी फफूंदी): पत्तियों पर सफेद पाउडर जैसी परत जम जाती है। इसके नियंत्रण के लिए हेक्साकोनाजोल 5% SC (1 मि.ली./ली.) या सल्फर 80% WP (2 ग्राम/ली.) का छिड़काव करें।
• जड़ गलन और उखटा रोग: इसमें पौधे अचानक मुरझा जाते हैं और जड़ें भूरे रंग की हो जाती हैं। इसका नियंत्रण ट्राइकोडर्मा विरिडे (5 ग्राम/किग्रा बीज) या कार्बेन्डाजिम 50% WP (1 ग्राम/ली.) से करें।
40-60 दिन (पूर्व पुष्पन चरण)
इस चरण में पौधों की वृद्धि तेजी से होती है, लेकिन कुछ कीट और रोग पत्तियों और तनों को प्रभावित कर सकते हैं।
• थ्रिप्स और माइट्स (मकड़ी): ये पत्तियों को सिकुड़ने और विकृत करने का कारण बनते हैं। नियंत्रण के लिए अबामेक्टिन 1.9% EC (0.5 मि.ली./ली.) या स्पाइरोमेसिफेन 22.9% SC (1 मि.ली./ली.) का छिड़काव करें।
• एन्थ्रेक्नोज (फफूंदी रोग): यह पत्तियों और फलों पर काले, गहरे धब्बे बनाता है। इसे रोकने के लिए मैंकोजेब 75% WP (2 ग्राम/ली.) या एज़ोक्सीस्ट्रोबिन 23% SC (1 मि.ली./ली.) का छिड़काव करें।
60-80 दिन (फूल लगने और फलों की प्रारंभिक अवस्था)
इस समय फल बनना शुरू हो जाता है, लेकिन कीटों का प्रकोप उत्पादन को नुकसान पहुंचा सकता है।
• फ्रूट बोरर (फल छेदक कीट): यह फल में छेद कर अंदर का भाग खा जाता है। इसे रोकने के लिए इमामेक्टिन बेंजोएट 5% SG (0.4 ग्राम/ली.) या क्लोरेंट्रानिलीप्रोल 18.5% SC (0.3 मि.ली./ली.) का छिड़काव करें।
• बैक्टीरियल लीफ स्पॉट: इसमें पत्तियों पर पीले घेरे वाले भूरे-काले धब्बे बन जाते हैं। इसे रोकने के लिए कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 50% WP (3 ग्राम/ली.) या स्ट्रेप्टोमाइसिन सल्फेट (1 ग्राम/ली.) का छिड़काव करें।
80-100 दिन (फल विकास और परिपक्वता चरण)
इस समय ध्यान फलों की गुणवत्ता सुधारने और उन्हें बीमारियों से बचाने पर होता है।
• पाउडरी मिल्ड्यू (चूर्णी फफूंदी): यह पत्तियों और फलों पर सफेद फफूंद की परत बनाता है। इसे रोकने के लिए टेबुकोनाज़ोल 25% EC (1 मि.ली./ली.) या वेटेबल सल्फर (2 ग्राम/ली.) का छिड़काव करें।
• वायरल रोग (CMV, TMV): इसमें पत्तियों पर पीले-हरे धब्बे और पौधों का विकास रुक जाता है। इसका कोई सीधा इलाज नहीं है, लेकिन सफेद मक्खी और एफिड्स को नियंत्रित कर सकते हैं इमिडाक्लोप्रिड 17.8% SL (0.3 मि.ली./ली.) का छिड़काव करके।
सामान्य प्रबंधन सुझाव
1. फसल चक्र अपनाएं: हर साल एक ही खेत में मिर्च न लगाएं, इससे रोगों का संचय कम होगा।
2. पीले चिपचिपे जाल (Yellow Sticky Traps) का उपयोग करें: सफेद मक्खी, थ्रिप्स और एफिड्स की निगरानी और नियंत्रण में मदद करता है।
3. नीम का तेल (1-2%): कीटों को नियंत्रित करने का जैविक विकल्प है।
4. संतुलित उर्वरक प्रबंधन: इससे पौधों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।
5. समुचित सिंचाई और जल निकासी: इससे जड़ गलन और अन्य फफूंदी जनित रोगों से बचाव होता है।
इस कीट एवं रोग प्रबंधन योजना को अपनाकर स्वस्थ और अधिक उपज देने वाली मिर्च की फसल प्राप्त की जा सकती है। यदि आपको और अधिक जानकारी चाहिए तो बताएं!