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UDHU OR BUDHU
09/07/2025

UDHU OR BUDHU

राज और उद्धव ठाकरे के दो दशक बाद एक मंच पर आना केवल मराठी अस्मिता की बात नहीं है, इसके पीछे एक गहरी राजनीतिक रणनीति भी नजर आती है — और इसका सबसे बड़ा कारण माना जा रहा है नरेंद्र मोदी और भाजपा का बढ़ता राजनीतिक दबाव।

बीते वर्षों में महाराष्ट्र की राजनीति में भाजपा ने अपनी पकड़ लगातार मजबूत की है। एक ओर उन्होंने शिवसेना को दो फाड़ कर दिया, और शिंदे गुट को साथ लेकर सत्ता में बने रहे, वहीं दूसरी ओर कांग्रेस और एनसीपी जैसी परंपरागत विपक्षी ताकतें अंदरूनी कलह और कमजोर नेतृत्व से जूझ रही हैं। ऐसे माहौल में ठाकरे भाइयों को यह साफ दिखने लगा कि अगर उन्होंने साथ नहीं दिया तो भाजपा का राजनीतिक दबदबा और बढ़ेगा, और उनकी स्वयं की राजनीतिक जमीन सिकुड़ती जाएगी।

उद्धव ठाकरे को यह एहसास हो गया है कि अकेले शिवसेना (उद्धव गुट) के दम पर भाजपा-शिंदे गठबंधन को टक्कर देना मुश्किल है, खासकर मुंबई महानगरपालिका जैसे चुनावों में जहां भाजपा पूरी ताकत झोंकने को तैयार है। वहीं राज ठाकरे की पार्टी भी सीमित प्रभाव में है और उन्हें भी बड़ा मंच चाहिए जहां उनकी प्रासंगिकता फिर से स्थापित हो सके।

इसलिए ये माना जा रहा है कि 'मोदी का डर' — यानी भाजपा की राजनीतिक मशीनरी, रणनीति और संसाधनों की ताकत — ही एक बड़ी वजह है कि वर्षों से अलग चल रहे ठाकरे बंधु अब एकजुट होने को तैयार दिख रहे हैं। यह एक प्रकार की "राजनीतिक आत्मरक्षा" की रणनीति है — जहां पुरानी रंजिशों को भुलाकर एक बड़ा मराठी चेहरा खड़ा किया जा सके जो मोदी लहर का प्रभाव कम कर सके।

इस मेल-मिलाप को अगर राजनीतिक चश्मे से देखा जाए तो यह सिर्फ मराठी गर्व की भावना नहीं, बल्कि मोदी और भाजपा के खिलाफ विपक्ष की एकजुटता का संकेत भी है — एक संकेत कि 2024 के बाद की राजनीति में अब व्यक्तिगत दूरियां नहीं, बल्कि सत्ता की रणनीतियाँ मायने रखेंगी।

30/10/2024

यह मुसलमान महाराष्ट्र से है । ये माइक पर बोल रहा है कि महाराष्ट्र में मुसलमान केंद्र सरकार की कई योजनाओं का लाभ लेते है प्रधानमंत्री आरोग्य योजना , प्रधानमंत्री आवास योजना और लाडली बहना योजना सभी का ये मुसलमान पूरा लाभ लेते है।

इस ने कहा प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत इसे ढाई लाख मील चुके है। प्रधानमंत्री जननी सुरक्षा योजना के तहत इसे 5000 मीले प्रधानमंत्री जनधन योजना के तहत इसे 10000 मीले लाडली बहन योजना के तहत 7500 रुपये मीले । इतना कुछ इसे मील चुका है लेकिन फिर भी ये कोंग्रेस को ही वोट देगा।

इस मुसलमान ने कैमरे पर ये भी स्वीकार किया कि कोंग्रेस ने 70 सालो में कोई खास काम नही किया भाजपा ने कोंग्रेस से ज्यादा काम किया और भाजपा ने कोंग्रेस से ज्यादा मुसलमानों को दिया लेकिन फिर भी ये कोंग्रेस को ही वोट देगा।

क्योंकि कोंग्रेस इस के हिसाब से एक धर्मनिरपेक्ष पार्टी है जो भाईचारे को बनाकर रखती है । इस के हिसाब से भाजपा ने काम तो बहुत किया लेकिन भाजपा भाईचारे वाली पार्टी नही है।

क्या अब भी कोई शक है कि मुसलमान भाजपा से सारी सुविधाएं लेकर भी भाजपा को नही बल्कि कोंग्रेस को वोट देता है । ये लोग मोदी से सारी सुविधाएं लेंगे लेकिन वोट केवल कोंग्रेस को ही देंगे।

धनतेरस की ढ़ेर सारी शुभकामनाएं 🎊सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया।सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत्...
29/10/2024

धनतेरस की ढ़ेर सारी शुभकामनाएं 🎊

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत्।।

सभी सुखी होवें, सभी रोगमुक्त रहें, सभी मंगलमय के साक्षी बनें और किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े।

इन्हीं मंगलकामनाओं के साथ भगवान धन्वन्तरि के प्राकट्य दिवस धनतेरस की ढ़ेर सारी शुभकामनाएं।

secreat the four ring in front of Audy car
25/10/2024

secreat the four ring in front of Audy car

भारतीयम्  सनातन की प्रतिक्रिया.. 'हलाल' का प्रतिउत्तर 'ओम्'..दुर्गापूजा को कट्टरपंथियों ने निशाना बनाया है तो इन दिनों ल...
25/10/2024

भारतीयम् सनातन की प्रतिक्रिया.. 'हलाल' का प्रतिउत्तर 'ओम्'..

दुर्गापूजा को कट्टरपंथियों ने निशाना बनाया है तो इन दिनों लगातार ऐसी भी खबरें आईं जहां खाने में मिलावट या गलत किस्म का खाना खिलाने का दावा किया गया.

सबसे पहले कांवड़ यात्रा के दौरान निर्देश जारी किए गए कि खाने की दुकान चलाने वाला अपने सही नाम को दुकान पर लिखें. फिर कुछ ऐसी खबरें आईं जब रोटी में थूक और जूस में URINE मिलाने के आरोप लगे. तिरुपति मंदिर के प्रसाद में भी मिलावट का दावा किया गया.

लोगों को मिलावट से बचा रहा ओम सर्टिफिकेट!

ऐसी ही कथित मिलावट से बचाने का दावा करता है महाराष्ट्र में ओम सर्टिफिकेट. महाराष्ट्र में ओम प्रतिष्ठान नाम की एक संस्था पहले से ओम सर्टिफिकेट जारी करती आई है. जिसके साथ दावा होता है कि सर्टिफिकेट जिस दुकान पर होता है. वहां खाना साफ सुथरा होता है.

अब संस्था का दावा है कि खाने की शुद्धता और साफ सफाई की कथित गारंटी देने वाला ओम सर्टिफिकेट दूसरी जगहों के लिए भी जारी किया जाएगा. क्या है ये ओम सर्टिफिकेट और क्यों ओम सर्टिफिकेट को अब राजनीतिक मुद्दा बनाया जा रहा है. इन सवालों का जवाब देगी DNA की EXCLUSIVE REPORT.

वीर सावरकर के पोते ने शुरू किया अभियान

ओम सर्टिफिकेट और उसका स्कैनर. वीर सावरकर के पोते रंजीत सावरकर ने ये अभियान कुछ वक्त पहले ही शुरु किया है. दुकानों को उनकी स्वच्छता और खाने की शुद्धता के आधार पर ये सर्टिफिकेट दिया जाता है. रंजीत सावरकर का दावा है कि अब ओम सर्टिफिकेट को खाने की दुकानों से आगे ले जाया जाएगा.

ओम सर्टिफिकेट के साथ दुकानदार को एक बार कोड भी मिलता है. बार कोड को स्कैन कर ग्राहक जान सकता है कि ओम प्रतिष्ठान के मुताबिक दुकान में शुद्ध खाना मिलता है या नहीं. बार कोड से पता चलता है कि दुकान के मालिक का नाम क्या है.

पहल से संतुष्ट नजर आए ग्राहक

रंजीत सावरकर का कहना है कि इस ओम सर्टिफिकेट को बनाने के पीछे मकसद था ग्राहकों को ऐसी दुकानों के बारे में बताना है, जहां खाने के जरिए उनके स्वास्थ्य और आस्था दोनों के साथ खिलवाड़ ना किया जाए.

जब ज़ी मीडिया रिपोर्टर ने लोगों से बात की तो वो भी ओम सर्टिफिकेट को लेकर संतुष्ट दिखे. लोगों का कहना था कि खाना निज विचारों और आस्था से जुड़ा है तो ओम सर्टिफिकेट जैसी व्यवस्था कारगर है.

विपक्षी दलों ने अभियान पर जताई आपत्ति

अब ओम सर्टिफिकेट अभियान का दायरा बढ़ाने का ऐलान हुआ तो राजनीति में भी ओम सर्टिफिकेट गूंजने लगा. विपक्षी दलों ने ओम सर्टिफिकेट को चुनाव से जोड़ दिया.

ओम सर्टिफिकेट से चुनाव पर किस तरह फर्क पड़ेगा. ये विपक्षी नेता ही जानें...लेकिन एक सवाल है. क्या वाकई ओम सर्टिफिकेट को शुद्धता की गारंटी माना जा सकता है. जब शुद्धता की जांच के लिए सरकारी एजेंसियां हैं तो फिर ओम सर्टिफिकेट जैसी व्यवस्था की जरूरत क्यों.

GREAT
25/10/2024

GREAT

निस्वार्थ भाव ऐसे होता है…..।
25/10/2024

निस्वार्थ भाव ऐसे होता है…..।

जागो मेरा भारतवासियो ! अगर जीती भाजपा तो भारत अखण्ड राष्ट्र होगा !
24/10/2024

जागो मेरा भारतवासियो !
अगर जीती भाजपा तो भारत अखण्ड राष्ट्र होगा !

यह होता है नेतृत्व का फर्क👍👍👍👍
23/10/2024

यह होता है नेतृत्व का फर्क👍👍👍👍

कुछ दिन पहले एक परिचित के घर गया था। जिस वक्त घर में मैं बैठा था, उनकी मेड घर की सफाई कर रही थी। मैं ड्राइंग रूम में बैठ...
23/10/2024

कुछ दिन पहले एक परिचित के घर गया था। जिस वक्त घर में मैं बैठा था, उनकी मेड घर की सफाई कर रही थी। मैं ड्राइंग रूम में बैठा था, मेरे परिचित फोन पर किसी से बात कर रहे थे। उनकी पत्नी चाय बना रही थीं। मेरी नज़र सामने वाले कमरे तक गई, जहां मेड फर्श पर पोछा लगा रही थी।

अचानक मेरे कानों में आवाज़ आई।

“बुढ़िया अभी ज़मीन पर पोछा लगा है, नीचे पांव मत उतारना। मैं बार-बार यही नहीं करती रहूंगी।”

मैंने अपने परिचित से पूछा, “मां कमरे में हैं क्या?

“हां।”

“जब तक चाय बन रही है, मैं मां से मिल लेता हूं।”

“हां, हां। लेकिन रुकिए, अभी-अभी शायद पोछा लगा है, सूख जाए,फिर जाइएगा।”

"क्यों? गीला है तो मेड दुबारा लगाएगी। नहीं लगाएगी तो थोड़े निशान रह जाएंगे फर्श पर। क्या फर्क पड़ेगा?"

परिचित थोड़ा हैरान हुए । भैया ऐसा क्यों कह रहे हैं?

तब तक मैं कमरे में चला गया था। गीले पर्श पर पांव के खूब निशान उकेरता हुआ।

मैं मां के पास गया। मैंने उनके पांव छुए और फिर उनसे कहा कि चलिए आप भी ड्राइंग रूम में, वहां साथ बैठ कर चाय पीते हैं। चाय बन रही है। भाभी रसोई में चाय बना रही हैं।

मैंने इतना ही कहा था। मां एकदम घबरा गईं।

“अरे नहीं , अभी फर्श पर पांव नहीं रखना है। फर्श गीला है न, मेरे पांव के निशान पड़ जाएंगे।”

“पांव के निशान पड़ जाएंगे? वाह! फिर तो मैं उनकी तस्वीर उतार कर बड़ा करवा कर फ्रेम में लगाऊंगा। आप चलिए तो सही।”

पर मां बिस्तर से नीचे नहीं उतर रही थीं। उन्होंने कहा कि तुम चाय पी लो बेटा।

तब तक मेरे परिचित भी मां के कमरे तक आ गए थे।

उन्होंने मुझसे कहा कि मां सुबह चाय पी चुकी है। आप आइए भैया ।

"नहीं। मां के साथ मैं यहीं कमरे में चाय लूंगा।"

चमकते हुए टाइल्स पर मेरे जूते के निशान बयां कर रहे थे कि मैंने जानबूझ कर कुछ निशान छोड़े हैं। वो समझ नहीं पा रहे थे कि आखिर मैंने ऐसा किया ही क्यों?

उन्होंने मुझसे तो कुछ नहीं कहा, लेकिन मेड को उन्होंने आवाज़ दी। "बबिता, जरा इधर आना। इधर भैया के पांव के निशान पड़ गए हैं, उन्हें साफ कर देना।"

बबीता ने गीला पोछा फर्श पर लगाया। जैसे ही फर्श की दुबारा सफाई हुई मैं फिर खड़ा होकर उस पर चल पड़ा। दुबारा निशान पड़ गए।

अब बबिता हैरान थी। मेरे परिचित भी। तब तक उनकी पत्नी भी कमरे में आ चुकी थीं।

उन्होंने कहा, " भैया, आइए चाय रखी है।"

मैंने परिचित की पत्नी से कहा कि ‘बुढ़िया’ के लिए चाय यहीं दे दीजिए।

मेरे परिचित ने मेरी ओर देखा।

मैंने कहा कि हैरान मत होइए।

वो चुप थे।

मैंने कहा कि मुझे ऐसा लगता है कि आप लोग मां को प्यार से बुढ़िया बुलाते हैं।

मेड वहीं खड़ी थी। सन्न। परिचित की पत्नी वहीं खड़ी थी, सन्न।

परिचित ने पूछा, "क्या हुआ भैया ?"

हुआ कुछ नहीं। मैंने खुद सुना है कि आपकी बबिता मां को बुढ़िया कह कर बुला रही थी। उसने मां को बिस्तर से उतरने से धमकाया भी था। यकीनन काम वाली ने मां को बुढ़िया पहली बार नहीं कहा होगा। बल्कि वो कह भी नहीं सकती उन्हें बुढ़िया। उसने सुना होगा। बेटे के मुंह से। बहू के मुंह से। बिना सुने वो नहीं कह सकती थी।

जाहिर है आप लोग प्यार से मां को इसी नाम से बुलाते होगे, तभी तो उनसे कहा।

पल भर के लिए धरती हिलने लगी थी। गीले फर्श पर हज़ारों निशान उभर आए थे।[1]

मेरे परिचित के छोटे-छोटे पांव के निशान वहां उभरे हुए हैं। बच्चा भाग रहा है। मां खेल रही है बच्चे के साथ-साथ। एक निशान, दो निशान, निशान ही निशान। मां खुश रही है। बेटे के पांव देख कर कह रही है, देखो तो इसके पांव के निशान। बेटा इधर से उधर दौड़ रहा था। दौड़ता जा रहा था, पूरे घर में।

बुढ़िया रो रही थी। बहू की आंखें झुकी हुई थीं। बबिता चुप थी।

“भैया, गलती हो गई। अब नहीं होगा ऐसा। भैया बहुत बड़ी भूल थी मेरी।”

मेरे परिचित अपनी आंखें पोंछ रहे थे।

मैं चल पड़ा। सिर्फ इतना कह कर कि आँखें ही पोंछनी चाहिए। उस फर्श को तो चूम लेना चाहिए जहां मां के पांव के निशान पड़े हों।[2]

साभार

इस कहानी के लिए इससे उपयुक्त चित्र कोई और नहीं लगा।✍️✍️💐💐

पूरे हिन्दू समाज को बधाई हो..सुप्रीम कोर्ट ने वक्फ बोर्ड का तंबू फाड़ डाला है 😂😂😂"मुस्लिम वक्फ बोर्ड Vs जिंदल ग्रुप and ...
21/10/2024

पूरे हिन्दू समाज को बधाई हो..

सुप्रीम कोर्ट ने वक्फ बोर्ड का तंबू फाड़ डाला है 😂😂😂

"मुस्लिम वक्फ बोर्ड Vs जिंदल ग्रुप and others केस"

बीते शुक्रवार को जिस दिन देश भर में मुस्लिमों द्वारा अलविदा नमाज पढ़ी जा रही थी... देश की सुप्रीम कोर्ट एक ऐसे अहम मामले में फैसला सुना रहा था..

जो कि, आगामी समय में देश की दशा और दिशा बदल सकता है.

वो केस था... "मु स्लिम वक्फ बोर्ड बनाम जिंदल ग्रुप केस"

ये केस कुछ इस तरह का था कि... राजस्थान सरकार ने 2010 में जिंदल ग्रुप ऑफ कम्पनीज को एक जमीन माइनिंग के लिए अलॉट की.

उस जमीन के एक भाग पर एक छोटा सा चबूतरा और उससे लगा एक दीवार बना हुआ था.

इसी ग्राउंड पर वक्फ बोर्ड ने इस जमीन पर दावा किया परंतु सुप्रीम कोर्ट ने उसके इस दावे की हवा निकाल कर एक माईल स्टोन जजमेंट दे दिया.

लेकिन, इस घटना को ठीक से समझने के लिए पहले हमें नियम कानून को ठीक से जानने की आवश्यकता है.

असल में नियम यह है कि जब कोई जमीन / प्रोपर्टी किसी से खरीदी या बेची जाती है तो उस जमीन का सर्वे होता है जो कि कोई सरकारी अमीन या तहसीलदार करते हैं..

उसके बाद उस जमीन के बारे में आपत्ति मांगी जाती है.

अगर कहीं से कोई आपत्ति नहीं आई तो फिर उस जमीन का नए मालिक के नाम पर दाखिल खारिज कर दिया जाता है.

इस... वक्फ के मामले में भी कुछ ऐसा ही है.

वक्फ Act 1965 और 1995 के अनुसार... अगर वक्फ बोर्ड किसी जमीन पर अपना दावा करता है तो वक्फ के सर्वेयर उस जमीन पर जाकर उसका सर्वे करते हैं और अगर उन्हें ऐसा लगा ( if they feel) कि ये वक्फ बोर्ड की जमीन है तो वे उसे अपने रिकॉर्ड में चढ़ा लेते हैं.

लेकिन, अगर किसी को वक्फ बोर्ड के इस कृत्य पर आपत्ति हो तो वो "वक्फ ट्रिब्यूनल" में उसकी शिकायत कर सकता है.

और, वक्फ ट्रिब्यूनल का फैसला उसके लिए बाध्यकारी होगा.. क्योंकि, इसे कोर्ट में चैलेंज नहीं किया जा सकता है.

(ये नियम खान्ग्रेस सरकार का बनाया हुआ है)

खैर... तो राजस्थान के जमीन के मामले में भी ऐसा ही हुआ.

उस जमीन पर मौजूद चबूतरे और दीवार की वजह से वक्फ बोर्ड के सर्वेयर 1965 में उस जमीन पर गए और उस जमीन को वक्फ बोर्ड की संपत्ति घोषित कर उसे वक्फ बोर्ड के रिकॉर्ड में चढ़ा लिया.

कालांतर में... 1995 में नया Act आने के बाद वक्फ बोर्ड के सर्वेयर ने फिर उसे वक्फ की संपत्ति घोषित करते हुए उसे अपने रिकॉर्ड में चढ़ा लिया.

इसीलिए... जब 2010 में राजस्थान सरकार ने इस जमीन को माइनिंग हेतु जिंदल ग्रुप को दिया तो वहां के लोकल अंजुमन कमिटी ने इस पर आपत्ति की और इसे वक्फ बोर्ड की संपत्ति बताते हुए वक्फ बोर्ड को चिट्ठी लिख दी.

इसके बाद वक्फ बोर्ड इसे अपनी संपत्ति बताते हुए सरकार के निर्णय पर आपत्ति जताई और वहाँ बाउंड्री करना शुरू कर दिया.

इस पर मामला राजस्थान हाईकोर्ट चला गया जहाँ फिर वक्फ बोर्ड ने आपत्ति जताई कि 1965 और 1995 की वक्फ एक्ट के तहत ये संपत्ति हमारी है और ये हमारे रिकॉर्ड में भी चढ़ा हुआ है.

इसीलिए, सरकार इसे किसी को नहीं दे सकती है और न ही कोर्ट इस केस को सुन सकती है क्योंकि अगर कोई डिस्प्यूट है भी...

तो, उसे हमारा वक्फ ट्रिब्यूनल सुनेगा न कि कोर्ट.

इस पर राजस्थान हाईकोर्ट ने आर्टिकल 226 का हवाला देते हुए वक्फ बोर्ड को क्लियर किया कि...

वो किसी भी ट्रिब्यूनल या लोअर कोर्ट से ऊपर है और आर्टिकल 226 के तहत वो इस केस को सुन सकता है.

और, हाईकोर्ट ने इस मामले में एक स्पेशलाइज्ड कमेटी बिठा दी.

2012 में कमेटी ने अपनी रिपोर्ट कोर्ट को सौंपी एवं उसके बाद कोर्ट ने आदेश दे दिया कि ये वक्फ बोर्ड की संपत्ति नहीं है और इसे माइनिंग के लिए दिया जा सकता है.

इस फैसले से वक्फ बोर्ड नाखुश होकर सुप्रीम कोर्ट चला गया.

लेकिन, सुप्रीम कोर्ट में मामला फंस गया.

क्योंकि... सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि आपने क्या सर्वे किया है अथवा आपके रिकॉर्ड में क्या चढ़ा है... वो सब जाने दो.

हम तो कानून जानते हैं...

और, कानून के अनुसार (वक्फ एक्ट 1995 की धारा 3 R के अनुसार) कोई भी प्रोपर्टी वक्फ की प्रॉपर्टी तभी हो सकती है अगर वो निम्न शर्तों को पूरा करता है ...

1. वो जिसकी प्रोपर्टी है अगर वो इसे वक्फ के तौर पर अर्थात इस्लामिक पूजा प्रार्थना के लिए सार्वजनिक तौर पर इस्तेमाल करता हो/ करता था.

2. वो संपत्ति वक्फ के तौर पर इस्तेमाल करने के लिए दान की गई हो.

3. राज्य सरकार द्वारा उस जमीन को किसी रिलिजियस काम के लिए ग्रांट की हो.

4. अथवा, उस जमीन के मजहबी उपयोग के लिए जमीन के मालिक ने डीड बना कर दी हो.

सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा कि वक्फ एक्ट 1995 के अनुसार उपरोक्त शर्तों को पूरा करने वाली प्रोपर्टी ही वक्फ की प्रॉपर्टी मानी जायेगी.

इसके अलावा कोई भी संपत्ति वक्फ की संपत्ति नहीं है.

इसके अनुसार... जिस प्रॉपर्टी पर आप दावा कर रहे हो...

उस प्रॉपर्टी को न तो आपको किसी ने दान में दी है, न ही उसकी कोई डीड है और न ही वो आपने खरीदी है.

इसीलिए, वो संपत्ति आपकी नहीं है और उसे माइनिंग के लिए दिया जाना बिल्कुल कानून सम्मत है.

👉👉 अब सवाल है कि ये तो महज एक फैसला है और इसमें माइल स्टोन जैसा क्या है ?

तो, इसके लिए हम थोड़़ा इतिहास में जाते हैं कि असल में हुआ क्या है।

जब 1945 के आसपास लगभग ये तय हो चुका था कि भारत अब आजाद हो जाएगा और भारत का विभाजन भी लगभग तय ही था...

तो, भारत के वैसे मूतलमान जो.. पिग्गिस्तान जाने का मन बना चुके थे.. (जिसमें से बहुत सारे नबाब और छोटे छोटे रियासतों के राजा, जमींदार वगैरह थे) ने आनन फानन में अपनी जमीनों पर वक्फ बना दिया और भारत छोड़कर पिग्गिस्तान चले गए.

जिसके बाद देश में मुसरिम तुष्टिकरण में आकंठ डूबी सरकार के आ जाने के बाद वो संपत्ति/जमीन वक्फ बोर्ड के पास चली गई.

ऐसी लगभग 6-8 लाख स्क्वायर किलोमीटर जमीन होने का अंदेशा है.

इसके अलावा... कालांतर में रेलवे एवं नगर निगम की खाली जमीन, सार्वजनिक मैदानों, किसी निजी व्यक्ति के खाली प्लाटों आदि पर यहाँ के मूतलमानों अथवा शरारती तत्वों ने मिट्टी के कुछेक ढेर जमा कर दिए और ये दावा कर दिया कि.... यहाँ हमारी मस्जिद/ ईदगाह/ कब्रिस्तान है...

इसीलिए, ये वक्फ की संपत्ति है.

और, चूंकि 2014 से पहले लगभग हर जगह इनकी तुष्टिकरण वाली सरकारें थी तो उन्होंने इनके दावे को आंख बंद कर मान लिया और उन संपत्तियों को वक्फ बोर्ड के रिकॉर्ड में जाने दिया.

लेकिन, अब सुप्रीम कोर्ट ने ये स्पष्ट आदेश पारित कर दिया है कि...

👉1947 से पहले ट्रांसफर किये गए किसी भी संपत्ति पर वक्फ बोर्ड का अधिकार नहीं होगा क्योंकि उसके कागज मान्य नहीं होंगे.

👉इसके अलावा... 1947 के बाद भी जिन संपत्तियों पर वक्फ बोर्ड अपना अधिकार जताता है.... उनके कागज उसे दिखाने होंगे कि वे संपत्तियां उसके पास आईं कहाँ से ?

और, वक्फ बोर्ड के पास संपत्ति आने के लिए वही शर्त हैं जो ऊपर उल्लेखित किया गया है.

👉👉👉अगर... वक्फ बोर्ड अपने किसी संपत्ति का प्रॉपर कागज नहीं दिखा पाता है तो सुप्रीम कोर्ट के शुक्रवार के फैसले के आलोक में वो जमीन/संपत्ति अपने मूल मालिक को वापस दे दी जाएगी.

👉और, अगर जमीन/ संपत्ति का मूल मालिक बंटवारे के बाद देश छोड़कर जा चुका है अथवा 1962, 1965 & 1971 के युद्ध में पिग्गिस्तान का साथ देने के आरोप के कारण भाग गया है.

तो, उस स्थिति में वो संपत्ति "शत्रु संपत्ति अधिनियम 2017" के तहत सरकार की हो जाएगी.

अब इसमें हमें और आपको सिर्फ करना ये है कि...

अगर आपके आसपास कोई ऐसी संपत्ति/जमीन है जो कि आपके अनुसार वक्फ बोर्ड का नहीं होना चाहिए तो आप इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का हवाला देते हुए संबंधित सरकार अथवा कोर्ट को सूचित कर सकते हैं.

और, सरकार / कोर्ट उस जमीन को वक्फ बोर्ड के अतिक्रमण से मुक्त करवाने के लिए बाध्य होगी क्योंकि ये सुप्रीम कोर्ट का आदेश है.

और हाँ... अगर आपकी जानकारी में ऐसा कुछ नहीं है तो भी आप इस पोस्ट को अधिकाधिक लोगों/ग्रुप्स तक प्रचारित कर दें..

ताकि, अगर किसी के जानकारी में ऐसा हो तो वो इस संबंध में उचित कदम उठा सके.

ध्यान रहे कि... 1947 में बंटवारे के समय पूर्वी एवं पश्चिमी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) को मिलाकर उन्हें लगभग 10 लाख 32 हजार स्क्वायर किलोमीटर जमीन दी गई थी और एक अनुमान के मुताबिक कम से कम इतनी ही जमीन/संपत्ति आज भारत में वक्फ बोर्ड के कब्जे /रिकॉर्ड में है.

इसीलिए, इस संबंध में आपका इस मैसेज को प्रचारित कर लोगों को जागरूक करना ही अपने आप में बहुत बड़ी राष्ट्रभक्ति होगी.

जय मातृ भूमि जय मां भारती जय हिन्द 🥀

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