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19/06/2026
18/06/2026

1941की जनगणना के अनुसार उस समय अविभाजित भारत की जनसंख्या 56 करोड़ थी।
इसमें मुस्लिम आबादी 7 करोड़ 44 लाख थी।
जब विभाजन हुआ तब पाकिस्तान को 10.29 लाख वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र प्राप्त हुआ था,
जबकि विभाजित भारत के पास बचा रहने वाला भूभाग 32.87 लाख वर्ग किलोमीटर रह गया।
सोचिए, आप सब कि अविभाजित भारत में मुसलमानों की आबादी लगभग 13% थी,
और उन्हें अलग राष्ट्र के रूप में मिलने वाले भूभाग का क्षेत्रफल अविभाजित भारत के कुल क्षेत्रफल का 25% से ज्यादा बड़ा भूभाग या हिस्सा था।
मुस्लिमों की हिंसा, गुंडई और अलग देश लेने की जिद,
किन्तु उससे भी ज्यादा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के हिन्दू नेताओं की मूढ़ता, कायरता और आरामपसंदगी ने कितनी आसानी से विभाजन को स्वीकार किया था,
इसे 70, 80 साल पहले का इतिहास पलट कर कोई भी पढ़ जान सकता है।
अब इस आंकड़े में यह चीज देखिए कि 56 करोड़ की कूल आबादी में मुस्लिम आबादी थी 7 करोड़ 44 लाख।
अर्थात कुल आबादी का 13%.
और विभाजन के बाद इस 13% आबादी अर्थात 7 करोड़ 44 लाख आबादी में से लगभग आधे मुसलमान अर्थात 3 करोड़ 54 लाख मुसलमान यहीं अविभाजित भारत में रुक गए,
जबकि अविभाजित भारत के 97% मुसलमानों ने एकजुट होकर अपने लिए मजहब के आधार पर एकदम पृथक राष्ट्र पाकिस्तान का निर्माण वोटिंग करते हुए करवाया था।
सोचिए, कैसे चूतिया काटा कांग्रेस और गांधी व नेहरू ने देश का।
पहले तो 13% मुस्लिम आबादी को पूरे राष्ट्र के भौगोलिक क्षेत्रफल का 25% हिस्सा दे डाला,
फिर उस 13% मुस्लिम जनसंख्या में से 5% को खंडित भारत के भूभाग में पुनः बसवा दिया।
अर्थात पाकिस्तान जाने वाले मुसलमान केवल 8% रहे।
अब भौगोलिक और जनसांख्यिकीय समीकरण का त्रासद चित्र देखिए।
9% मुसलमानों ने भारतमाता के 25% हिस्से पर बलात् कब्जा जमाया।
और शेष 4% जो यहां रह गए,
उन्होंने इसी कांग्रेस,
नेहरू और उनके उत्तराधिकारियों की मदद से अपने नए मंसूबे को आकार देना आरम्भ कर दिया...
लेकिन सबसे बड़ी विडंबना देखिए कि हिन्दू अपने इतिहास से कुछ सीखने समझने को तैयार नहीं हैं,
और सबसे ज्यादा त्रासद यह है कि उन्हें झूठा इतिहास पढ़वा कर सच्चाई से लगातार दूर भी रखने का षड्यंत्र किया गया है।
कितना दुखद पक्ष है कि हिन्दू अपने जीवन के इतने नजदीक घटित होने वाले अर्थात 70, 80 साल पहले घटित होने वाले इतिहास तक की सच्चाई या एकदम असली बात जानते तक नहीं .
साभार शंकर शरण जी... See less

17/06/2026

जनसत्ता दल लोकतंत्रिक के राष्ट्रीय अध्यक्ष रघुराज प्रताप सिंह राजा भैया ने अपने बयान में कहा कि भारत इसलिए धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है, क्योंकि यह हिंदू बाहुल, सनातन बाहुल है। राजा भैया ने कहा कि कोई मुस्लिम बाहुल देश सेकुलर नहीं है। अगर कोई हो तो बता दें। राजा भैया ने कहा कि हर मुस्लिम बाहुल देश में शरिया कानून लागू है। राजा भैया ने कहा कि हम अपने उस बयान पर आज भी कायम है, जब तक हिंदू बाहुल है, तभी तक हमारा संविधान है, तभी तक हम धर्मनिरपेक्ष देश हैं।

प्राचीन रसशास्त्र: अग्निस्थाई (कायम) पारा और पारद बंधन​भारतीय रसशास्त्र (Rasashastra) के ग्रंथों जैसे 'रसरत्नसमुच्चय', '...
17/06/2026

प्राचीन रसशास्त्र: अग्निस्थाई (कायम) पारा और पारद बंधन
​भारतीय रसशास्त्र (Rasashastra) के ग्रंथों जैसे 'रसरत्नसमुच्चय', 'रसार्णव' और 'आनंदकंद' में पारद (पारे) को दिव्य धातु माना गया है। पारे का शोधन, मारण और बंधन करके उसे 'अग्निस्थाई' (Fire-resistant / Solidified) बनाना प्राचीन रसायनविदों (Alchemists) का मुख्य लक्ष्य था।
​⚠️ महत्वपूर्ण सुरक्षा चेतावनी (Safety Disclaimer)
​अत्यंत आवश्यक सूचना: पारा (Mercury) और उसके वाष्प (Vapors) अत्यंत विषैले, न्यूरोटॉक्सिक (मस्तिष्क को हानि पहुँचाने वाले) और जानलेवा होते हैं। पारे को बिना उचित वैज्ञानिक उपकरणों, सुरक्षा किट और अनुभवी गुरु के मार्गदर्शन के गर्म करना या उसका शोधन करना कानूनन प्रतिबंधित और शारीरिक रूप से बेहद खतरनाक है। यह दस्तावेज़ केवल ऐतिहासिक, दार्शनिक और शैक्षणिक ज्ञान-वर्धन के लिए है। इसे घर पर दोहराने का प्रयास बिल्कुल न करें।
​१. अग्निस्थाई पारा (कायम पारद) क्या है?
​साधारण पारा 357^\circ\text{C} पर उबलने लगता है और पूरी तरह वाष्प में बदल जाता है। प्राचीन सिद्धों के अनुसार, जब पारे के सभी भौतिक व रासायनिक दोषों को दूर करके उसे स्थिर (ठोस) कर दिया जाता है, तो वह 1000^\circ\text{C} से अधिक तापमान पर भी उड़ता नहीं है। इसे ही 'अग्निस्थाई पारद' या 'कायम पारा' कहा जाता है। रसशास्त्र में इसे मोक्ष और कायाकल्प (दीर्घायु) का साधन माना गया है।
​२. पारद के अष्ट-संस्कार (Purification Steps)
​प्राचीन शास्त्रों के अनुसार, अशुद्ध पारे का सीधे प्रयोग करना विष के समान है। पारे को अग्निस्थाई बनाने से पहले उसके अष्ट-संस्कार (Eight Stage Purification) किए जाते हैं:
​स्वेदन (Steaming): पारे को औषधीय काढ़े और त्रिकटु के साथ पोटली में बांधकर डोला-यंत्र में भाप दी जाती है।
​मर्दन (Trituration): विभिन्न औषधियों और लवणों के साथ पारे को खरल (मूसल) में लंबे समय तक रगड़ा जाता है।
​मूर्च्छन (Swooning): त्रिफला और अन्य जड़ी-बूटियों के साथ घिसकर पारे की चंचलता को नष्ट किया जाता है।
​उत्थापन (Resuscitation): मूर्च्छित पारे को पुनः अपने स्वाभाविक रूप में लाया जाता है।
​पातन (Distillation): पारे को 'पातन यंत्र' (Distillation apparatus) के माध्यम से उर्ध्वपातन (sublimation) कर शुद्ध किया जाता है।
​रोधन (Restoration of potency): पारे की प्राकृतिक शक्ति और वीर्यता को जगाया जाता है।
​नियमन (Regulation): पारे की अत्यधिक चंचलता को नियंत्रित करने के लिए विशेष जड़ी-बूटियों के साथ रगड़ा जाता है।
​दीपन (Stimulation): पारे की ग्रास (अन्य धातुओं को पचाने की क्षमता) को तीव्र किया जाता है।
​३. पारद बंधन (Mercury Binding / Solidification) की प्राचीन विधियाँ
​पारे को ठोस रूप देने की प्रक्रिया को 'रस-बंधन' कहा जाता है। शास्त्रों में २५ प्रकार के बंधनों का उल्लेख है। अग्निस्थाई बनाने के लिए मुख्य रूप से निम्नलिखित प्राचीन तकनीकों का उपयोग किया जाता था:
​विधि क: गंधक जारण विधि (The Sulfur Incineration Method)
​रसशास्त्र का एक मूलभूत नियम है—"यस्य नास्ति गंधकः, तस्य नास्ति पारदः" (अर्थात गंधक के बिना पारद का नियमन संभव नहीं है)।
​सिद्धांत: शुद्ध पारे में धीरे-धीरे गंधक (Sulfur) मिलाकर उसे पचाया (जारण) जाता है।
​प्रक्रिया: 1. शुद्ध पारा और शुद्ध गंधक को समान मात्रा में लेकर 'तप्त खरल' (हल्के गर्म खरल) में तब तक घिसा जाता है जब तक वह पूरी तरह काले रंग के महीन चूर्ण में न बदल जाए। इसे कज्जली (Kajjali / Black Sulphide of Mercury) कहते हैं।
2. इस कज्जली को एक 'मूषा' (मिट्टी की क्रूसिबल / Crucible) में रखकर ऊपर से कपड़-मिट्टी (मिट्टी और कपड़े की परतें) से बंद कर दिया जाता है।
3. इसे जमीन में 'पुट' (विशेष गड्ढा जिसमें उपले भरकर आग लगाई जाती है) देकर मंद-मंद आंच पर पकाया जाता है।
4. इस प्रक्रिया को बार-बार दोहराया जाता है (शास्त्रों में ६ गुना से लेकर १८ गुना गंधक जारण का उल्लेख है)। इस प्रक्रिया के बाद पारा अपनी तरलता छोड़ देता है और अग्नि पर रखने पर भी नहीं उड़ता।
​विधि ख: दिव्य जड़ी-बूटियों (औषधियों) द्वारा बंधन
​प्राचीन तांत्रिक और रस-ग्रंथों में कुछ ऐसी वनस्पतियों का वर्णन है जिनके स्वरस (रस) में पारे को घिसने से वह जम जाता है:
​मुख्य जड़ी-बूटियाँ: वज्रदंती, अमरबेल, ग्वारपाठा (कुमारी), शंखपुष्पी, स्नूही (थूहर) का दूध, अपामार्ग (आंधीझाड़ा), और 'नकछिकनी' नामक बूटी।
​प्रक्रिया: - ताजी जड़ी-बूटियों का गाढ़ा रस निकालकर पारे के साथ खरल में लगातार ३ से ७ दिनों तक घिसा जाता है।
​घिसते-घिसते पारा एक सघन गोली या पिंड का रूप ले लेता है।
​इसके बाद इस पिंड को विशेष जड़ी-बूटियों के कल्क (पेस्ट) के बीच रखकर कपड़-मिट्टी की परतों से लपेटकर सुखाया जाता है और गजपुट (अग्नि का संपुट) में तपाया जाता है। अग्नि शांत होने पर अंदर से जमा हुआ अग्निस्थाई पारद प्राप्त होता है।
​४. आधुनिक रासायनिक दृष्टिकोण (Modern Chemical Analysis)
​आधुनिक विज्ञान के दृष्टिकोण से प्राचीन रसशास्त्र की इन प्रक्रियाओं को इस प्रकार समझा जा सकता है:
​मर्करी सल्फाइड (Mercury Sulfide): पारे और गंधक को रगड़ने पर और गर्म करने पर जो यौगिक बनता है, वह रासायनिक रूप से Cinnabar (HgS) या मर्करी सल्फाइड होता है। शुद्ध पारा बहुत अस्थिर है, लेकिन गंधक के साथ रासायनिक बंध (Chemical bond) बनाने के बाद इसका क्वथनांक (Boiling point) बदल जाता है और यह अत्यधिक स्थिर हो जाता है।
​अमलगम (Amalgams): कुछ जड़ी-बूटियों में प्राकृतिक रूप से जस्ता (Zinc), तांबा (Copper) या अन्य धातुएं सूक्ष्म मात्रा में पाई जाती हैं। जब पारा इनके संपर्क में आता है, तो वह अमलगम (मिश्र धातु) बना लेता है, जिससे वह ठोस दिखने लगता है।
​धातु परिवर्तन (Alchemy): प्राचीन ग्रंथों में पारे से सोना या चांदी बनाने के दावों के पीछे असल में तांबे, कांसे आदि धातुओं पर पारे की परत चढ़ाकर या अमलगम बनाकर उनका रंग बदलना था, जिसे आधुनिक विज्ञान रासायनिक कोटिंग या अलॉय फॉर्मेशन (Alloy formation) मानता है।
​निष्कर्ष
​प्राचीन भारत की रसशास्त्र विद्या केवल अंधविश्वास नहीं थी, बल्कि यह भारत की आदि-रसायनशाला (Ancient Metallurgy) का आधार थी। 'अग्निस्थाई पारा' बनाने की विधियाँ इस बात का प्रमाण हैं कि हमारे प्राचीन वैज्ञानिक पारे जैसी कठिन धातु को नियंत्रित करने की कला में पारंगत थे। हालांकि, इसके निर्माण में उपयोग होने वाले भारी धातु और उनके वाष्प अत्यधिक विषाक्त होते हैं, इसलिए इस विद्या को केवल वैज्ञानिक और ऐतिहासिक धरोहर के रूप में ही सराहा जाना चाहिए।

13/06/2026

कोयले की खान से हरियाली तक, अदाणी ग्रुप ने सरगुजा खदान में लगाए 16 लाख पेड़ और ऐसे बदल डाली तस्‍वीर

छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में जो इलाका केवल कोयला खदान के तौर पर जाना जाता रहा, उसे बड़े पैमाने पर पौधरोपण करके हरे-भरे इलाके में बदला जा रहा है. अदाणी एंटरप्राइजेज ने पारसा ईस्ट और कांता बासन (PEKB) खदान के 568 हेक्टेयर क्षेत्र में 16 लाख से ज्‍यादा पेड़-पौधे लगाए हैं. इस हरियाली प्रोजेक्ट ने यह साबित कर दिया है कि कोयला निकालने के बाद भी खदान की जमीन को फिर से पहले जैसा सुंदर बनाया जा सकता है.

कंपनी के अधिकारियों ने बताया कि कंपनी राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड (RVUNL) के लिए 'डेवलपर और ऑपरेटर' के रूप में इस खदान का संचालन करती है.

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02/10/2025

सत्य घटनाये
‘कहीं स्तनपान करते शिशु को छीन कर 2 टुकड़े किए,
तो कहीं बार-बार रेप के बाद मरी माँ की लाश पर खेल रहा था बच्चा’:-
#मोपला_हिन्दू_नरसंहार ...

केरल में मोपला मुस्लिमों द्वारा किए गए नरसंहार पर RSS विचारक जे नंदकुमार ने लोगों को इतिहास से अवगत कराया है। उन्होंने बताया कि किस तरह कॉन्ग्रेस की संस्थापक एनी बेसेंट ने भी मालाबार का दौरा किया था वहाँ के पीड़ित हिन्दुओं से बात की।
उन्होंने लिखा है कि किस तरह एक गर्भवती हिन्दू महिला का पेट फाड़ कर भ्रूण को निकाल कर उसे क्षत-विक्षत कर दिया गया। ऐसी कई डरावनी घटनाएँ हुईं।

जे नंदकुमार ने एक और घटना का जिक्र किया।
एक शिशु अपनी माता का स्तनपान कर रहा था।
मोपला मुस्लिमों ने उस बच्चे को उसकी माता की छाती से छीन कर उसके दो टुकड़े कर दिए।

इस घटना का जिक्र एनी बेसेंट ने भी किया है।
एक जगह एक महिला का बार-बार इस तरह क्रूरता से रेप किया गया कि उसकी मृत्यु हो गई। उसका छोटा सा बच्चा काफी देर तक अपनी मरी हुई माँ के शरीर पर खेलता रहा और स्तनपान करने की कोशिश करता रहा – कितना हृदय विदारक दृश्य रहा होगा ये।

कई विद्वानों ने इसे पूरी दुनिया की सबसे क्रूरतम घटना बताई। खुद शंकरन नायर ने ऐसा बताया है, जो कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष रहे थे। बाबासाहब आंबेडकर का कहना था कि ये दंगा नहीं था, हिन्दुओं पर मुस्लिमों का आक्रमण था। एनी बेसेंट ने तो पूछा है कि क्या ये लोग शैतान थे? मलयालम महाकवि कुमार असन ने ‘दुरावस्था’ नाम के खंडकाव्य लिखा है कि ये मुस्लिम शैतान हैं क्या, क्या इनकी माताएँ-बहनें नहीं हैं?

एक वर्ष के भीतर पुस्तक प्रकाशित हुआ और उन्हें इस्लामी कट्टरपंथियों की धमकी मिलने लगी कि वो इसे वापस लें, लेकिन उन्होंने कहा कि ये पीड़ितों से बात कर के लिखी गई है और वो इसे वापस नहीं लेंगे।
1924 में उनकी हत्या हो गई और इसका कारण आज तक पता नहीं चला। 2 दिन बाद नाव से उनकी लाश मिली। नाव का वो कमरा बाहर से बंद था। वो तैराकी में दक्ष थे। लेकिन, छोटे नदी में डूब कर उनके मरने की कहानी पर कैसे कोई विश्वास करे?
क्या ये साजिश नहीं थी?

इसके बाद जे नंदकुमार ने कुछ आँकड़े सामने रखे, जिसमें सबसे प्रमुख था कि मोपला मुस्लिमों द्वारा 10,000 हिन्दुओं का नरसंहार किया गया।
उनकी जमीनें, मंदिर और खेत – सब छीन कर नष्ट कर दी गई। उन्होंने बताया कि जहाँ एक वीभत्स हत्याकांड हुआ, वहाँ हमारे मारे गए भाई-बहनों की याद में एक स्मारक तक नहीं बनवाने दिया गया। लेकिन,
मोपला मुस्लिमों और उनके वंशजों को सरकारी रुपयों से, हमारे टैक्स के पैसों से पेंशन दी जा रही है।

उन्होंने कहा कि 100 वर्षों से हिन्दू पीड़ितों को न्याय नहीं मिला है। उन्होंने लोगों से इसके लिए आगे आने की अपील करते हुए कहा कि अच्छे लोग खामोश रहते हैं, इसीलिए अन्याय होता है। उन्होंने लोगों से तटस्थ न रहने की अपील करते हुए केरल में मालाबार के हिन्दुओं,
वहाँ के पीड़ितों के वंशजों से बात कर के उनकी वेदना को समझने की अपील की। उन्होंने वीर सावरकर की पुस्तक ‘मोपला, अर्थात इससे मुझे क्या?’ नामक पुस्तक को पढ़ने की भी अपील की।

उन्होंने इस ‘खिलाफत आंदोलन’ और मोपला द्वारा हिन्दू नरसंहार की निंदा करते हुए अंत में कहा कि इसका योगदान भारत के विभाजन में भी था। उन्होंने सच्चाई के साथ खड़े होने की अपील करते हुए कहा कि इन चीजों पर फिर से अध्ययन किया जाना चाहिए।

बता दें कि मोपला मुस्लिमों द्वारा हिन्दुओं के नरसंहार के 100 वर्ष पूरे होने पर आयोजित कार्यक्रम में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी शिरकत की।

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