Rameej Raja

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Rameej Raja DS "International Humanity Society" खौफ़ खुदा से...नफरत गुनाह से...मोहब्बत मुस्तफ़ा(स अ व) से ....

05/09/2026

Humare Jaiso Ke Hisse Me Sabr Aata Hai,
Itna Sabr, Ke Khwahishe Dam Tod Jaati Hai..!

03/09/2026

भारतीय वैज्ञानिक और Cipla के चेयरमैन डॉ. यूसुफ़ हामिद ने जीवनरक्षक दवाओं को गरीब मरीजों की पहुँच में लाने के लिए उल्लेखनीय कार्य किया।
1990 के दशक के अंत में उनके नेतृत्व में तीन HIV antiretroviral दवाओं को एक खुराक में संयोजित किया गया।
वर्ष 2001 में Cipla ने विकासशील देशों के लिए यह उपचार लगभग एक डॉलर प्रतिदिन में उपलब्ध कराने की पेशकश की।
इस पहल ने विशेष रूप से अफ्रीका में HIV/AIDS उपचार की कीमत घटाने और उसकी उपलब्धता बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
Royal Society के अनुसार उनके affordable-treatment प्रयासों ने लाखों जीवन बचाने में सहायता की।
भारत सरकार ने दवा उद्योग में उनके योगदान के लिए 2005 में उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया।
उनकी यात्रा बताती है कि विज्ञान की सबसे बड़ी सफलता वही है जो जरूरतमंद इंसान तक पहुँचे। 💊🌍

#प्रेरकइतिहास

29/08/2026

इतिहास के पन्नों से: वो क्रांतिकारी खगोलशास्त्री जिसने कॉपरनिकस से सदियों पहले टॉलेमी के ब्रह्मांड को चुनौती दी! जब हम अंतरिक्ष विज्ञान के इतिहास में बड़े बदलावों की बात करते हैं, तो अक्सर हमारा ध्यान सीधे 16वीं सदी के निकोलस कॉपरनिकस पर जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि 12वीं सदी में ही स्पेन की धरती पर एक ऐसा वैज्ञानिक पैदा हुआ था, जिसने प्राचीन ग्रीक खगोलशास्त्री टॉलेमी के स्थापित सिद्धांतों की चूलें हिला दी थीं?

आज बात करते हैं नूर अल-दीन इब्न अहमद इब्न अली अल-बितरुजी यानी अल्पेट्रैगियस (Alpetragius) की!

मोरक्को में जन्मे और कॉर्डोबा (मुस्लिम स्पेन) में पले-बढ़े अल-बितरुजी एक असाधारण खगोलशास्त्री और विचारक थे। वे महान दार्शनिक इब्न तुफैल के शागिर्द थे और अपने गुरु की तरह ही वे भी पुरानी लकीर के फकीर बनने के बजाय हर सिद्धांत को तर्क की कसौटी पर कसते थे।

उनकी सबसे बड़ी पहचान और ऐतिहासिक उपलब्धियाँ:
किताब अल-हयाह (Book on Astronomy): यह उनकी सबसे प्रसिद्ध और ऐतिहासिक कृति है। इस किताब में उन्होंने उस दौर में पूरी दुनिया में मानी जाने वाली टॉलेमी की 'एपिसिर्कल्स' (Epicycles - ग्रहों की जटिल वृत्ताकार गतियाँ) की थ्योरी को खारिज कर दिया। उनका मानना था कि ब्रह्मांड का ढांचा इतना जटिल और अजीब नहीं हो सकता।

होमोसेंट्रिक स्फेयर्स (Homocentric Spheres) का पुनरुद्धार: अल-बितरुजी ने एक ऐसा वैकल्पिक खगोलीय मॉडल पेश किया, जिसमें सभी ग्रह एक ही केंद्र के चारों ओर घूमते थे। भले ही उनका यह मॉडल पूरी तरह सूर्य-केंद्रित (Heliocentric) नहीं था, लेकिन इसने टॉलेमी के हज़ारों साल पुराने भ्रम को तोड़कर आने वाले वैज्ञानिकों (जैसे कॉपरनिकस) के लिए एक नया रास्ता खोल दिया।

चंद्रमा के क्रेटर का नाम: अंतरिक्ष विज्ञान में उनके इस महान योगदान के सम्मान में, आज हमारे चांद पर मौजूद एक प्रसिद्ध क्रेटर (Crater) का नाम आधिकारिक तौर पर उनके लैटिन नाम पर "अल्पेट्रैगियस क्रेटर" (Alpetragius Crater) रखा गया है!
13वीं सदी में जब उनकी किताबों का लैटिन और हिब्रू भाषा में अनुवाद हुआ, तो इसने पूरे यूरोप के खगोलशास्त्रियों को एक नई सोच दी। अल-बितरुजी हमें सिखाते हैं कि विज्ञान में कोई भी सिद्धांत अंतिम नहीं होता, और सच तक पहुँचने के लिए स्थापित मान्यताओं पर सवाल उठाना बेहद ज़रूरी है।

चांद पर एक क्रेटर का नाम इस महान अंडलुसियन वैज्ञानिक के नाम पर होना, अपने आप में उनके काम की गवाही देता है। क्या आपने आज से पहले अल-बितरुजी (Alpetragius) के बारे में सुना था? कमेंट सेक्शन में अपने विचार ज़रूर साझा करें और इतिहास के इस महान खगोलशास्त्री की विरासत को दुनिया के सामने लाने के लिए इस पोस्ट को Like और Share करना न भूलें!

मुल्क की आज़ादी के लिए उलेमा-ए-देवबंद की कुर्बानियां इतनी हैं कि साल भर लिखा जाए, फिर भी नहीं खत्म होंगी। 👇एक वाकिया हुस...
18/08/2026

मुल्क की आज़ादी के लिए उलेमा-ए-देवबंद की कुर्बानियां इतनी हैं कि साल भर लिखा जाए, फिर भी नहीं खत्म होंगी। 👇

एक वाकिया हुसैन अहमद मदनी (र.अ.) का है...

सामने मौत और मौलाना हुसैन अहमद मदनी का फतवा...

हज़रत मौलाना हुसैन अहमद मदनी (مولانا حسين أحمد مدني) भारत के मशहूर इस्लामी आलिम, मुहद्दिस और स्वतंत्रता सेनानी थे। वे खास तौर पर दारुल उलूम देवबंद से जुड़े रहे और अपने इल्म, तालीम और सियासी सोच की वजह से जाने जाते हैं।

एक वाकिया आपने सुना होगा, जब मौलाना को अंग्रेज़ी हुकूमत की अदालत में पेश किया गया...

अंग्रेज़ जज ने हज़रत मदनी से कहा:
“मैंने सुना है, आपने फतवा दिया है कि अंग्रेज़ी फौज में भर्ती होना हराम है।”

हज़रत मदनी ने कहा:
“दिया क्या होता है, अब भी कह रहा हूं—अंग्रेज़ों की फौज में भर्ती होना हराम है, हराम है, हराम है!”

जज ने कहा:
“आपको पता है इसकी सज़ा क्या है?”

हज़रत मदनी ने अपनी गठरी खोली और सफेद कपड़ा निकालकर आसमान की तरफ़ लहराया और कहा: 👇

“ओ अंग्रेज़ जज! तू भी सुन ले, जब हुसैन अहमद देवबंद से आ रहा था, तो अपना कफ़न भी अपने साथ लेकर आया है।”

ये कुर्बानियां हैं हमारे अकाबिरीन की और व्हाट्सएप्प विश्विद्यालय से अधूरा ज्ञान प्राप्त चाटुकार देवबंद के बारे में कुछ भी भोंकते है। 😢

ये मुल्क यूं ही आसानी से नहीं मिला है, हमारे बुज़ुर्गों की बड़ी कुर्बानियों के बाद मिला है।
बहुत जद्दोजहद से मिली ये आजादी

हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई भाई-भाई

जय हिंद जय भारत जय भारतीय 🇮🇳


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17/08/2026

Here are the most effective ways to reduce exposure:
Increase Distance from Your Phone: When making calls, use speakerphone, wired earphones, or Bluetooth earbuds instead of holding the phone directly against your head.
Avoid Carrying Devices on Your Body: Keep your phone in a bag or backpack rather than directly in your pocket or bra for extended periods.
Create Distance at Night: Do not sleep with your phone under your pillow. Keep it on a nightstand across the room, or switch it to Airplane Mode while you sleep.
Reposition Your Wi-Fi Router: Place your home router in a central, open area rather than in your bedroom or right next to your desk.
Use Hardwired Connections: Where possible, connect computers and smart TVs directly to your router using an Ethernet cable and turn off the device's Wi-Fi receiver.
Watch Your Signal Strength: Phones emit more radiation when they are struggling to find a signal. Avoid making long calls in areas with poor reception (like elevators or rural highways), as the phone works harder and emits stronger RF waves to reach the nearest tower.


17/08/2026

भारत को छोड़ने से पहले अंग्रेजों की आख़िरी कूटनीति:

ज़रा ध्यान से सब लोग पढ़ें!
अगर पाकिस्तान मुसलमानों के लिए अलग देश बन रहा था और बंटवारे की बुनियाद ही धर्म थी, तो नेताओं ने साफ-साफ क्यों नहीं कहा कि सारे मुसलमान पाकिस्तान चले जाएं और सारे हिंदू भारत आ जाएं?

आज यह सवाल इसलिए और बड़ा लगता है, क्योंकि बाद के इतिहास ने इसे और भारी बना दिया। कश्मीर का विवाद, सीमा पर लगातार तनाव, तीन युद्ध, पलायन और सांप्रदायिक सियासत... इन सबको देखकर बहुत से लोगों को लगता है कि शायद 1947 में फैसला अधूरा रह गया। उनका मानना है कि अगर देश के साथ हिंदू और मुस्लिमों का बंटवारा हो गया होता, तो सारी न सही... लेकिन बहुत सी मुश्किलें कम हो जातीं।

दिलचस्प बात है कि उस समय भी आबादी की अदला-बदली की मिसाल मौजूद थी। ग्रीस और तुर्की ने वही किया था, जिसकी चर्चा भारत में हुई। 1923 में ग्रीस और तुर्की के बीच एक समझौता हुआ, जिसे इतिहास में लॉजेन संधि के नाम से जाना जाता है। इससे पहले दोनों देशों के बीच युद्ध हुआ था। युद्ध खत्म हुआ, लेकिन समस्या वही थी.. दोनों देशों में बड़ी संख्या में धार्मिक अल्पसंख्यक रहते थे। तुर्की में लाखों ईसाई यूनानी थे और ग्रीस में बड़ी मुस्लिम आबादी रहती थी। दोनों सरकारों ने फैसला किया कि अगर लोग वहीं रहे, तो भविष्य में फिर हिंसा होगी।

इसलिए इतिहास के सबसे कठोर फैसलों में से एक लिया गया। करीब 15 लाख यूनानी ईसाइयों को तुर्की छोड़ना पड़ा। करीब 5 लाख मुसलमानों को ग्रीस छोड़ना पड़ा। हजारों परिवार सिर्फ कपड़े और जरूरी सामान लेकर निकल पड़े। रास्ते में भूख, बीमारी और मौत भी आई। लेकिन कुछ वर्षों बाद ग्रीस लगभग पूरी तरह यूनानी ईसाई देश बन गया और तुर्की की धार्मिक बनावट भी बदल गई।

डॉ. भीमराव आंबेडकर ने 1940 में अपनी किताब Pakistan or the Partition of India लिखी। उन्होंने ग्रीस-तुर्की की इसी घटना का उदाहरण देते हुए लिखा कि अगर भारत का बंटवारा होता है, तो आबादी की अदला-बदली सबसे स्थायी समाधान हो सकती है। उनका साफ मानना था कि अगर दोनों देशों में बड़ी अल्पसंख्यक आबादी रह गई, तो वे भविष्य में राजनीतिक तनाव, दंगों और सीमा पार हस्तक्षेप का कारण बन सकती हैं। आंबेडकर ने लिखा, 'अल्पसंख्यकों का स्थानांतरण ही सांप्रदायिक शांति का सबसे स्थायी उपाय है।'

वहीं, अगर हिंदू महासभा के वीर सावरकर की बात की जाए, तो उन्होंने पाकिस्तान की आधिकारिक मांग होने से पहले ही 1937 में द्विराष्ट्र का सिद्धांत रख दिया। जब देश का विभाजन हो गया, तब भी सावरकर का यही रुख था कि आबादी का भी बंटवारा किया जाए। सावरकर का तर्क था कि भारतीय मुसलमानों और ईसाइयों की पवित्र भूमि मक्का या जेरूसलम जैसी जगहें हैं। इसलिए वे सांस्कृतिक रूप से इस राष्ट्र के साथ पूरी तरह एकाकार नहीं हो सकते।

अब सवाल उठता है कि कांग्रेस या जिन्ना ने आबादी की अदला बदला वाला रास्ता क्यों नहीं चुना? यहां सबसे बड़ा फर्क सोच का था। महात्मा गांधी आखिरी समय तक भारत के बंटवारे के खिलाफ थे। उन्होंने साफ कह दिया कि भारत किसी एक धर्म का देश नहीं। गांधी ने मुसलमानों को पूरा भरोसा दिलाया। कहा कि ये देश उनका भी उतना ही है, जितना किसी हिंदू का।

जवाहरलाल नेहरू की चिंता दूसरी थी। वे ऐसा भारत चाहते थे, जहां नागरिकता धर्म से तय न हो। अगर सरकार आदेश देती कि सारे मुसलमान पाकिस्तान चले जाएं, तो उनके हिसाब से भारत भी धार्मिक राष्ट्र बन जाता। ऐसा राष्ट्र, जहां कम से कम एक समुदाय के लिए कोई जगह न होती। उन्होंने भी मुस्लिम समुदाय को हिफाजत का पूरा भरोसा दिलाया।

उधर मोहम्मद अली जिन्ना का रुख भी पूरी तरह सीधा नहीं था। 11 अगस्त 1947 को पाकिस्तान की संविधान सभा में उन्होंने कहा, 'आप अपने मंदिरों में जाने के लिए आजाद हैं। आप अपनी मस्जिदों में जाने के लिए आजाद हैं।' हालांकि, पाकिस्तान के अखबार Dawn के पहले संपादक अल्ताफ हुसैन ने इसके बारे में एक दिलचस्प वाकया लिखा है।

अल्ताफ के मुताबिक, जिन्ना के करीबी सहयोगी और बाद में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने चौधरी मोहम्मद अली ने Dawn से कहा कि भाषण के कुछ हिस्से हटा दिए जाएं, क्योंकि वे मुस्लिम लीग की स्थापित लाइन से मेल नहीं खाते। अल्ताफ हुसैन ने मना किया, तो उन्होंने जिन्ना से सीधे बात की। जिन्ना ने कहा कि भाषण जैसा है, वैसा ही छपे।

जिन्ना ने पूरी मुस्लिम आबादी को पाकिस्तान में लेना क्या, उन मुस्लिमों के साथ भी दगा किया, जो पाकिस्तान बनाने के लिए जी-जान से जुटे थे। जिन्ना और मुस्लिम लीग ने उत्तर भारत, मध्य प्रदेश, बिहार और दक्षिण के उन करोड़ों साधारण मुसलमानों को पूरी तरह से उनके हाल पर छोड़ दिया। इनमें से ज्यादातर मुस्लिमों ने 1946 के चुनावों में मुस्लिम लीग और पाकिस्तान के पक्ष में जमकर वोट दिया था। उस चुनाव में मुस्लिम लीग ने मुस्लिमों के लिए आरक्षित लगभग 86% सीटें जीती थीं। इसी जीत के बाद जिन्ना ने कहा कि अब मुसलमानों ने पाकिस्तान के पक्ष में अपना फैसला दे दिया है।

इसी बात को सरदार वल्लभभाई पटेल ने भी रेखांकित किया। उनका मानना था कि मुस्लिम लीग ने दो-राष्ट्र सिद्धांत के आधार पर देश का बंटवारा करवाया है। करोड़ों मुसलमानों ने पाकिस्तान के पक्ष में मतदान किया है। उसके बाद भी भारत में रहने वाले मुस्लिमों की रातों-रात सोच और वफादारी बदल जाना मुमकिन नहीं। लखनऊ में एक ऐतिहासिक जनसभा को संबोधित करते हुए सरदार पटेल ने दो टूक शब्दों में कहा था:

'जो लोग पाकिस्तान के पक्ष में थे और जिन्होंने पाकिस्तान बनवाने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी, वे आज भी पाकिस्तान के लिए दिल में हमदर्दी रखते हैं। अगर उनकी वफादारी इस देश के साथ नहीं है, तो वे यहां क्यों रुके हुए हैं? उन्हें अपनी पसंद का रास्ता चुनना चाहिए।'

अगर नागरिकों के नजरिए से देखें, तो हर किसी के लिए मुल्क बदलना भी आसान नहीं था। मशहूर शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खान को जिन्ना ने पाकिस्तान बसने के लिए बुलाया। बहुत सी सुविधाएं देने का लालच भी दिया गया। लेकिन बिस्मिल्लाह खान ने साफ मना कर दिया। उन्होंने कहा कि क्या पाकिस्तान में गंगा नदी है। क्या वहां काशी के मंदिर हैं। उन्होंने कहा कि मेरी शहनाई काशी के घाटों और गंगा के पानी से सुर लेती है। मैं अपनी गंगा मैया को छोड़कर कहीं नहीं जा सकता। और वो पूरी जिंदगी बनारस में ही रहे।

एक और मिसाल पंजाब के मालेरकोटला शहर का है। बंटवारे के समय पूरे पंजाब में खून की नदियां बह रही थीं। लेकिन मालेरकोटला में एक भी कत्ल नहीं हुआ। इसका कारण पुराना इतिहास था। सिखों के दसवें गुरु गोबिंद सिंह जी के बच्चों को दीवार में चिनवाया जा रहा था। तब मालेरकोटला के नवाब ने इसके खिलाफ आवाज उठाई थी। इस बात को सिख समाज ने कभी नहीं भुलाया। उन्होंने मालेरकोटला के मुसलमानों की पूरी हिफाजत की।

मशहूर शायर साहिर लुधियानवी भी बंटवारे के समय पाकिस्तान चले गए थे। लेकिन वहां उनका मन बिल्कुल नहीं लगा। माहौल घुटन भरा लगा। अपनी पुरानी महफिलें याद आने लगीं। कुछ ही समय बाद वे पाकिस्तान छोड़कर वापस भारत आ गए। फिर उन्होंने भारतीय सिनेमा को एक से बढ़कर एक गीत दिए।

लेकिन, तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। सिंध और पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) में बहुत बड़ी संख्या में हिंदू रुके। उन्हें अपनी मिट्टी से प्यार था। सिंध के बहुत से हिंदू बड़े व्यापारी थे। उनका सदियों का कारोबार वहां फैला था। उन्हें लगा कि सरकारें बदल रही हैं। लेकिन उनके व्यापार पर कोई असर नहीं पड़ेगा। मगर बाद में वहां के हालात बिगड़े। बहुत से सिंधी हिंदुओं को मजबूर होकर भारत आना पड़ा।

जोगेंद्र नाथ मंडल की भी मिसाल है। वो बड़े दलित नेता थे। उन्होंने बंटवारे के समय पाकिस्तान में ही रुकने का फैसला किया था। पाकिस्तान के पहले कानून मंत्री भी बने। उन्हें लगता था कि पाकिस्तान में दलितों को बराबरी का हक मिलेगा। मगर उनका सपना बाद में टूट गया। उन्हें भी निराश होकर वापस लौटना पड़ा। जिन्ना के नए मुल्क से जो उम्मीदें थीं, वो खाक ही हो गईं।

सीमांत गांधी के नाम से मशहूर खान अब्दुल गफ्फार खान का दर्द भी याद करने लायक है। वे पख्तूनों के नेता थे। वे बंटवारे और पख्तूनिस्तान के पाकिस्तान में जाने के सख्त खिलाफ थे। जब कांग्रेस ने बंटवारे को मंजूरी दे दी तो वे टूट गए थे। उन्होंने रोते हुए कहा था कि आपने हमें भेड़ियों के आगे फेंक दिया है।ोवे पाकिस्तान में रहे। लेकिन उन्होंने जिंदगी भर वहां के सैन्य शासन का विरोध किया। इसके लिए उन्हें कई साल जेल में गुजारने पड़े।

बंटवारे के वक्त ट्रेनों का मंजर भी बहुत खौफनाक था। लोग अपना घर छोड़कर रेलवे स्टेशन तक जाते थे। लेकिन वहां लाशों से भरी ट्रेनें देखकर उनकी रूह कांप जाती। बहुत से परिवारों ने वही मंजर देखकर स्टेशन से वापस घर लौटने का फैसला किया। उन्होंने सोचा कि सफर में कटकर मरने से अच्छा है अपनी ही मिट्टी पर मर जाना।

यहां ब्रिटिश सरकार की भूमिका समझना भी जरूरी है। जब लॉर्ड माउंटबेटन फरवरी 1947 में भारत आए, तब सत्ता हस्तांतरण की तय तारीख जून 1948 थी। यानी एक साल से ज्यादा का समय था। लेकिन 1946 का डायरेक्ट एक्शन डे, नोआखाली, बिहार और पंजाब की हिंसा देखकर उन्हें लगा कि हालात हाथ से निकल रहे हैं।

माउंटबेटन ने तारीख खिसकाकर पहले रख दी। 15 अगस्त 1947। यानी करोड़ों लोगों के भविष्य का फैसला कुछ ही हफ्तों में होना था। अब सोचिए कि उसी दौरान क्या-क्या बांटना था... फौज, पुलिस, रेलवे, डाक, खजाना, सरकारी दफ्तर। और सबसे कठिन था, सरहद। और इन सबके बीच आबादी के बंटवारे पर कोई ठोस चर्चा ही न हो सकी।

बेशक हिंदुस्तान या पाकिस्तान की हुकूमत ने अनिवार्य आबादी की अदला-बदली का कानून नहीं बनाया, लेकिन पंजाब में हालात ने लगभग वही कर दिया। पश्चिमी पंजाब से हिंदू और सिख लगभग पूरी तरह निकल गए। पूर्वी पंजाब से अधिकांश मुसलमान चले गए। पाकिस्तान में हालत तो और बदतर हो गए। जिन्ना ने अपने पहले भाषण में चाहे जो कहा, लेकिन पाकिस्तान कट्टर इस्लामिक ही रहा।

पश्चिमी पाकिस्तान से लगभग पूरी हिंदू-सिख आबादी निकल गई। पूर्वी पाकिस्तान से भी अगले दशकों में हिंदुओं की संख्या लगातार घटती गई। इसके उलट भारत में करोड़ों मुसलमान यहीं रहे और भारतीय नागरिक बने। वैज्ञानिक बने, राष्ट्रपति बने, उपराष्ट्रपति बने, क्रिकेटर बने, क्रिकेट टीम के कप्तान बने।

लेकिन, पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिंदुओं की लगातार घटती आबादी और भारत में सांप्रदायिक तनाव इस सवाल को कभी खत्म नहीं होने देते कि क्या 1947 में अधूरा फैसला लिया गया था? अगर आंबेडकर वाला रास्ता अपनाया जाता यानी आबादी की पूरी अदला-बदली होती, तो क्या आज तस्वीर अलग रहती? और जो सबसे बड़ा सवाल उस समय अधूरा रह गया, वह आज भी सरहद के दोनों तरफ खड़ा दिखाई देता है...

अगर देश का बंटवारा धर्म के आधार पर हुआ था, तो क्या उसे पूरा करने की हिम्मत किसी नेता ने क्यों नहीं दिखाई? न गांधी ने, न नेहरू ने, न पटेल ने और न ही उस जिन्ना... जिसने सबसे पहले धर्म के नाम पर अलग मुल्क मांगा था।







16/08/2026

उतरे हुए चेहरों तुम्हें आज़ादी मुबारक
उजड़े हुए लोगों तुम्हें आज़ादी मुबारक

सहमी हुई गलियों कोई मेला कोई नारा
जकड़े हुए शहरों तुम्हें आज़ादी मुबारक

ज़ंजीर की छन-छन पे कोई रक़्स-ओ-तमाशा
नारों के ग़ुलामों तुम्हें आज़ादी मुबारक

अब ख़ुश हो कि हर दिल में हैं नफ़रत के अलाव
ऐ दीन फ़रोशों तुम्हें आज़ादी मुबारक

बहती हुई आँखों ज़रा इज़हार-ए-मसर्रत
रिसते हुए ज़ख़्मों तुम्हें आज़ादी मुबारक

उखड़ी हुई नींदों मेरी छाती से लगो आज
झुलसे हुए ख़्वाबों तुम्हें आज़ादी मुबारक

टूटे हुए ख़्वाबों को खिलौने ही समझ लो
रोते हुए बच्चों तुम्हें आज़ादी मुबारक

फैले हुए हाथों इसी मंज़िल की तलब थी
सिमटी हुई बाहों तुम्हें आज़ादी मुबारक

हर ज़ुल्म पे ख़ामोशी की तसबीह में लग जाओ
चलती हुई लाशों तुम्हें आज़ादी मुबारक

मस्लक के ज़बानों के इलाक़ों के असीरों
बिखरे हुए लोगों तुम्हें आज़ादी मुबारक

— Ahmad Farhad

16/08/2026

ज़मीं पे चल न सका आसमान से भी गया
कटा के पर को परिंदा उड़ान से भी गया,
किसी के हाथ से निकला हुआ वो तीर हूँ
जो हदफ़ को छू न सका और कमान से भी गया,
भुला दिया तो भुलाने की इंतिहा कर दी
वो शख्स अब मेरे वहम-ओ-गुमान से भी गया,
तबाह कर गई पक्के मकान की ख्वाहिश
मैं अपने गाँव के कच्चे मकान से भी गया,
पराई आग में कूदा तो क्या मिला 'शाहिद'
उसे बचा न सका अपनी जान से भी गया ।।
~शाहिद कबीर

उमर सेंट जोसेफ़ इलाहाबाद टॉपर उसके बाद एमिटी यूनिवर्सिटी में उसका ज़िक्र प्रोफ़ेसर्स तक तारीफ़ क्या मुसलमान क्या हिंदू स...
09/08/2026

उमर सेंट जोसेफ़ इलाहाबाद टॉपर उसके बाद एमिटी यूनिवर्सिटी में उसका ज़िक्र प्रोफ़ेसर्स तक तारीफ़ क्या मुसलमान क्या हिंदू सब दीवाने। उसके बाद काल कोठरी का सफ़र सब महदूद चारदीवारी के भीतर लेकिन उसने पढ़ना नहीं छोड़ा अबान या कोई और दोनों भाइयों से जब भी मिलने जेल जाते तो एक दो किताबें जरूर साथ जाती थी हर मिलाई का था यह नियम था किताबें कार में अबान के मिली वो संदेश तमाचा है, उनके लिए जो नए नए नैरेटिव गढ़ रहे हैं, सब गिद्धों की ज़ुबान बंद कर दी जो फ़िराक़ में थे गलती करें हम लपकें।।

नमाज़-ए-जनाज़ा पढ़ाना उफ़्फ़ कितना कलेजा चाहिए किसी अपने का फिर ढंग से खड़े नहीं हो पाते उसने भाई को विदा किया क़ब्र पर खड़े ही दोनों भाइयों को गले लगाया हिम्मत दी चचेरे भाई मासूम बच्चे को गोदी में उठाकर चूमा सीने से लगाया उमर ने बड़ा होने का फर्ज़ अदा किया भीड़ को समझाते रहे और आख़िर में लौट गए सलाखों के पीछे लेकिन यह बच्चे कितने मैच्योर हैं, कितना सब्र है, यह महसूस हुआ, बड़ा बेटा बाप की गैरमौजूदगी में बाप का फर्ज़ निभाता है। अल्लाह सलामत रखे।।

एक महान सूफ़ी संत की आखिरी ख्वाहिश की अज़ीब शर्तों :हकीकत में यह सुल्तान इल्तुतमिश ही थे जिन्होंने हजरत कुतुबुद्दीन बख्त...
06/08/2026

एक महान सूफ़ी संत की आखिरी ख्वाहिश की अज़ीब शर्तों :
हकीकत में यह सुल्तान इल्तुतमिश ही थे जिन्होंने हजरत कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी की नमाज़-ए-जनाज़ा की इमामत की थी, क्योंकि सिर्फ वही उन शर्तों को पूरा कर सकते थे जो संत ने खुद उनके लिए तय की थीं, और मुझे पूरा यकीन है कि उस वली (संत) को इस बात का इल्म था।

शर्तें ये थीं:

​वह शख्स जो पहली तकबीर (अल्लाहू अकबर पुकारे जाने पर) के साथ जमाअत की नमाज़ में शामिल होता हो।

​जिसने कभी अपनी तहज्जुद की नमाज़ (आधी रात के बाद की नफ़्ल नमाज़) न छोड़ी हो।

​जिसने कभी किसी ग़ैर-महरम (वह शख्स जिससे निकाह जायज़ हो) को उस रिश्ते के अलावा न देखा हो जैसा कुरान में मुकर्रर (तय) किया गया है।

​वह इतना परहेजगार हो कि उसने कभी सुन्नत (नबी के बताए तरीके) नमाज़ न छोड़ी हो, खासकर अस्र (दोपहर की लाज़मी नमाज़) से पहले।

​जब ये शर्तें पढ़कर सुनाई गईं, तो वहाँ सन्नाटा छा गया। भला कौन इन कड़े उसूलों पर अमल कर सकता था? किसने अपनी ईमान की खातिर ऐसे अहकाम (नियमों) का पालन किया? तब सुल्तान आगे आए और उनकी रियासत ने उनके तकवे (परहेजगारी) की गहराई को महसूस किया।

#दिल्ली #भारतीय #इतिहास


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