17/08/2026
भारत को छोड़ने से पहले अंग्रेजों की आख़िरी कूटनीति:
ज़रा ध्यान से सब लोग पढ़ें!
अगर पाकिस्तान मुसलमानों के लिए अलग देश बन रहा था और बंटवारे की बुनियाद ही धर्म थी, तो नेताओं ने साफ-साफ क्यों नहीं कहा कि सारे मुसलमान पाकिस्तान चले जाएं और सारे हिंदू भारत आ जाएं?
आज यह सवाल इसलिए और बड़ा लगता है, क्योंकि बाद के इतिहास ने इसे और भारी बना दिया। कश्मीर का विवाद, सीमा पर लगातार तनाव, तीन युद्ध, पलायन और सांप्रदायिक सियासत... इन सबको देखकर बहुत से लोगों को लगता है कि शायद 1947 में फैसला अधूरा रह गया। उनका मानना है कि अगर देश के साथ हिंदू और मुस्लिमों का बंटवारा हो गया होता, तो सारी न सही... लेकिन बहुत सी मुश्किलें कम हो जातीं।
दिलचस्प बात है कि उस समय भी आबादी की अदला-बदली की मिसाल मौजूद थी। ग्रीस और तुर्की ने वही किया था, जिसकी चर्चा भारत में हुई। 1923 में ग्रीस और तुर्की के बीच एक समझौता हुआ, जिसे इतिहास में लॉजेन संधि के नाम से जाना जाता है। इससे पहले दोनों देशों के बीच युद्ध हुआ था। युद्ध खत्म हुआ, लेकिन समस्या वही थी.. दोनों देशों में बड़ी संख्या में धार्मिक अल्पसंख्यक रहते थे। तुर्की में लाखों ईसाई यूनानी थे और ग्रीस में बड़ी मुस्लिम आबादी रहती थी। दोनों सरकारों ने फैसला किया कि अगर लोग वहीं रहे, तो भविष्य में फिर हिंसा होगी।
इसलिए इतिहास के सबसे कठोर फैसलों में से एक लिया गया। करीब 15 लाख यूनानी ईसाइयों को तुर्की छोड़ना पड़ा। करीब 5 लाख मुसलमानों को ग्रीस छोड़ना पड़ा। हजारों परिवार सिर्फ कपड़े और जरूरी सामान लेकर निकल पड़े। रास्ते में भूख, बीमारी और मौत भी आई। लेकिन कुछ वर्षों बाद ग्रीस लगभग पूरी तरह यूनानी ईसाई देश बन गया और तुर्की की धार्मिक बनावट भी बदल गई।
डॉ. भीमराव आंबेडकर ने 1940 में अपनी किताब Pakistan or the Partition of India लिखी। उन्होंने ग्रीस-तुर्की की इसी घटना का उदाहरण देते हुए लिखा कि अगर भारत का बंटवारा होता है, तो आबादी की अदला-बदली सबसे स्थायी समाधान हो सकती है। उनका साफ मानना था कि अगर दोनों देशों में बड़ी अल्पसंख्यक आबादी रह गई, तो वे भविष्य में राजनीतिक तनाव, दंगों और सीमा पार हस्तक्षेप का कारण बन सकती हैं। आंबेडकर ने लिखा, 'अल्पसंख्यकों का स्थानांतरण ही सांप्रदायिक शांति का सबसे स्थायी उपाय है।'
वहीं, अगर हिंदू महासभा के वीर सावरकर की बात की जाए, तो उन्होंने पाकिस्तान की आधिकारिक मांग होने से पहले ही 1937 में द्विराष्ट्र का सिद्धांत रख दिया। जब देश का विभाजन हो गया, तब भी सावरकर का यही रुख था कि आबादी का भी बंटवारा किया जाए। सावरकर का तर्क था कि भारतीय मुसलमानों और ईसाइयों की पवित्र भूमि मक्का या जेरूसलम जैसी जगहें हैं। इसलिए वे सांस्कृतिक रूप से इस राष्ट्र के साथ पूरी तरह एकाकार नहीं हो सकते।
अब सवाल उठता है कि कांग्रेस या जिन्ना ने आबादी की अदला बदला वाला रास्ता क्यों नहीं चुना? यहां सबसे बड़ा फर्क सोच का था। महात्मा गांधी आखिरी समय तक भारत के बंटवारे के खिलाफ थे। उन्होंने साफ कह दिया कि भारत किसी एक धर्म का देश नहीं। गांधी ने मुसलमानों को पूरा भरोसा दिलाया। कहा कि ये देश उनका भी उतना ही है, जितना किसी हिंदू का।
जवाहरलाल नेहरू की चिंता दूसरी थी। वे ऐसा भारत चाहते थे, जहां नागरिकता धर्म से तय न हो। अगर सरकार आदेश देती कि सारे मुसलमान पाकिस्तान चले जाएं, तो उनके हिसाब से भारत भी धार्मिक राष्ट्र बन जाता। ऐसा राष्ट्र, जहां कम से कम एक समुदाय के लिए कोई जगह न होती। उन्होंने भी मुस्लिम समुदाय को हिफाजत का पूरा भरोसा दिलाया।
उधर मोहम्मद अली जिन्ना का रुख भी पूरी तरह सीधा नहीं था। 11 अगस्त 1947 को पाकिस्तान की संविधान सभा में उन्होंने कहा, 'आप अपने मंदिरों में जाने के लिए आजाद हैं। आप अपनी मस्जिदों में जाने के लिए आजाद हैं।' हालांकि, पाकिस्तान के अखबार Dawn के पहले संपादक अल्ताफ हुसैन ने इसके बारे में एक दिलचस्प वाकया लिखा है।
अल्ताफ के मुताबिक, जिन्ना के करीबी सहयोगी और बाद में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने चौधरी मोहम्मद अली ने Dawn से कहा कि भाषण के कुछ हिस्से हटा दिए जाएं, क्योंकि वे मुस्लिम लीग की स्थापित लाइन से मेल नहीं खाते। अल्ताफ हुसैन ने मना किया, तो उन्होंने जिन्ना से सीधे बात की। जिन्ना ने कहा कि भाषण जैसा है, वैसा ही छपे।
जिन्ना ने पूरी मुस्लिम आबादी को पाकिस्तान में लेना क्या, उन मुस्लिमों के साथ भी दगा किया, जो पाकिस्तान बनाने के लिए जी-जान से जुटे थे। जिन्ना और मुस्लिम लीग ने उत्तर भारत, मध्य प्रदेश, बिहार और दक्षिण के उन करोड़ों साधारण मुसलमानों को पूरी तरह से उनके हाल पर छोड़ दिया। इनमें से ज्यादातर मुस्लिमों ने 1946 के चुनावों में मुस्लिम लीग और पाकिस्तान के पक्ष में जमकर वोट दिया था। उस चुनाव में मुस्लिम लीग ने मुस्लिमों के लिए आरक्षित लगभग 86% सीटें जीती थीं। इसी जीत के बाद जिन्ना ने कहा कि अब मुसलमानों ने पाकिस्तान के पक्ष में अपना फैसला दे दिया है।
इसी बात को सरदार वल्लभभाई पटेल ने भी रेखांकित किया। उनका मानना था कि मुस्लिम लीग ने दो-राष्ट्र सिद्धांत के आधार पर देश का बंटवारा करवाया है। करोड़ों मुसलमानों ने पाकिस्तान के पक्ष में मतदान किया है। उसके बाद भी भारत में रहने वाले मुस्लिमों की रातों-रात सोच और वफादारी बदल जाना मुमकिन नहीं। लखनऊ में एक ऐतिहासिक जनसभा को संबोधित करते हुए सरदार पटेल ने दो टूक शब्दों में कहा था:
'जो लोग पाकिस्तान के पक्ष में थे और जिन्होंने पाकिस्तान बनवाने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी, वे आज भी पाकिस्तान के लिए दिल में हमदर्दी रखते हैं। अगर उनकी वफादारी इस देश के साथ नहीं है, तो वे यहां क्यों रुके हुए हैं? उन्हें अपनी पसंद का रास्ता चुनना चाहिए।'
अगर नागरिकों के नजरिए से देखें, तो हर किसी के लिए मुल्क बदलना भी आसान नहीं था। मशहूर शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खान को जिन्ना ने पाकिस्तान बसने के लिए बुलाया। बहुत सी सुविधाएं देने का लालच भी दिया गया। लेकिन बिस्मिल्लाह खान ने साफ मना कर दिया। उन्होंने कहा कि क्या पाकिस्तान में गंगा नदी है। क्या वहां काशी के मंदिर हैं। उन्होंने कहा कि मेरी शहनाई काशी के घाटों और गंगा के पानी से सुर लेती है। मैं अपनी गंगा मैया को छोड़कर कहीं नहीं जा सकता। और वो पूरी जिंदगी बनारस में ही रहे।
एक और मिसाल पंजाब के मालेरकोटला शहर का है। बंटवारे के समय पूरे पंजाब में खून की नदियां बह रही थीं। लेकिन मालेरकोटला में एक भी कत्ल नहीं हुआ। इसका कारण पुराना इतिहास था। सिखों के दसवें गुरु गोबिंद सिंह जी के बच्चों को दीवार में चिनवाया जा रहा था। तब मालेरकोटला के नवाब ने इसके खिलाफ आवाज उठाई थी। इस बात को सिख समाज ने कभी नहीं भुलाया। उन्होंने मालेरकोटला के मुसलमानों की पूरी हिफाजत की।
मशहूर शायर साहिर लुधियानवी भी बंटवारे के समय पाकिस्तान चले गए थे। लेकिन वहां उनका मन बिल्कुल नहीं लगा। माहौल घुटन भरा लगा। अपनी पुरानी महफिलें याद आने लगीं। कुछ ही समय बाद वे पाकिस्तान छोड़कर वापस भारत आ गए। फिर उन्होंने भारतीय सिनेमा को एक से बढ़कर एक गीत दिए।
लेकिन, तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। सिंध और पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) में बहुत बड़ी संख्या में हिंदू रुके। उन्हें अपनी मिट्टी से प्यार था। सिंध के बहुत से हिंदू बड़े व्यापारी थे। उनका सदियों का कारोबार वहां फैला था। उन्हें लगा कि सरकारें बदल रही हैं। लेकिन उनके व्यापार पर कोई असर नहीं पड़ेगा। मगर बाद में वहां के हालात बिगड़े। बहुत से सिंधी हिंदुओं को मजबूर होकर भारत आना पड़ा।
जोगेंद्र नाथ मंडल की भी मिसाल है। वो बड़े दलित नेता थे। उन्होंने बंटवारे के समय पाकिस्तान में ही रुकने का फैसला किया था। पाकिस्तान के पहले कानून मंत्री भी बने। उन्हें लगता था कि पाकिस्तान में दलितों को बराबरी का हक मिलेगा। मगर उनका सपना बाद में टूट गया। उन्हें भी निराश होकर वापस लौटना पड़ा। जिन्ना के नए मुल्क से जो उम्मीदें थीं, वो खाक ही हो गईं।
सीमांत गांधी के नाम से मशहूर खान अब्दुल गफ्फार खान का दर्द भी याद करने लायक है। वे पख्तूनों के नेता थे। वे बंटवारे और पख्तूनिस्तान के पाकिस्तान में जाने के सख्त खिलाफ थे। जब कांग्रेस ने बंटवारे को मंजूरी दे दी तो वे टूट गए थे। उन्होंने रोते हुए कहा था कि आपने हमें भेड़ियों के आगे फेंक दिया है।ोवे पाकिस्तान में रहे। लेकिन उन्होंने जिंदगी भर वहां के सैन्य शासन का विरोध किया। इसके लिए उन्हें कई साल जेल में गुजारने पड़े।
बंटवारे के वक्त ट्रेनों का मंजर भी बहुत खौफनाक था। लोग अपना घर छोड़कर रेलवे स्टेशन तक जाते थे। लेकिन वहां लाशों से भरी ट्रेनें देखकर उनकी रूह कांप जाती। बहुत से परिवारों ने वही मंजर देखकर स्टेशन से वापस घर लौटने का फैसला किया। उन्होंने सोचा कि सफर में कटकर मरने से अच्छा है अपनी ही मिट्टी पर मर जाना।
यहां ब्रिटिश सरकार की भूमिका समझना भी जरूरी है। जब लॉर्ड माउंटबेटन फरवरी 1947 में भारत आए, तब सत्ता हस्तांतरण की तय तारीख जून 1948 थी। यानी एक साल से ज्यादा का समय था। लेकिन 1946 का डायरेक्ट एक्शन डे, नोआखाली, बिहार और पंजाब की हिंसा देखकर उन्हें लगा कि हालात हाथ से निकल रहे हैं।
माउंटबेटन ने तारीख खिसकाकर पहले रख दी। 15 अगस्त 1947। यानी करोड़ों लोगों के भविष्य का फैसला कुछ ही हफ्तों में होना था। अब सोचिए कि उसी दौरान क्या-क्या बांटना था... फौज, पुलिस, रेलवे, डाक, खजाना, सरकारी दफ्तर। और सबसे कठिन था, सरहद। और इन सबके बीच आबादी के बंटवारे पर कोई ठोस चर्चा ही न हो सकी।
बेशक हिंदुस्तान या पाकिस्तान की हुकूमत ने अनिवार्य आबादी की अदला-बदली का कानून नहीं बनाया, लेकिन पंजाब में हालात ने लगभग वही कर दिया। पश्चिमी पंजाब से हिंदू और सिख लगभग पूरी तरह निकल गए। पूर्वी पंजाब से अधिकांश मुसलमान चले गए। पाकिस्तान में हालत तो और बदतर हो गए। जिन्ना ने अपने पहले भाषण में चाहे जो कहा, लेकिन पाकिस्तान कट्टर इस्लामिक ही रहा।
पश्चिमी पाकिस्तान से लगभग पूरी हिंदू-सिख आबादी निकल गई। पूर्वी पाकिस्तान से भी अगले दशकों में हिंदुओं की संख्या लगातार घटती गई। इसके उलट भारत में करोड़ों मुसलमान यहीं रहे और भारतीय नागरिक बने। वैज्ञानिक बने, राष्ट्रपति बने, उपराष्ट्रपति बने, क्रिकेटर बने, क्रिकेट टीम के कप्तान बने।
लेकिन, पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिंदुओं की लगातार घटती आबादी और भारत में सांप्रदायिक तनाव इस सवाल को कभी खत्म नहीं होने देते कि क्या 1947 में अधूरा फैसला लिया गया था? अगर आंबेडकर वाला रास्ता अपनाया जाता यानी आबादी की पूरी अदला-बदली होती, तो क्या आज तस्वीर अलग रहती? और जो सबसे बड़ा सवाल उस समय अधूरा रह गया, वह आज भी सरहद के दोनों तरफ खड़ा दिखाई देता है...
अगर देश का बंटवारा धर्म के आधार पर हुआ था, तो क्या उसे पूरा करने की हिम्मत किसी नेता ने क्यों नहीं दिखाई? न गांधी ने, न नेहरू ने, न पटेल ने और न ही उस जिन्ना... जिसने सबसे पहले धर्म के नाम पर अलग मुल्क मांगा था।