07/08/2021
"शुद्ध #कैंसरयुक्त नकली #देसी #घी"
चमड़ा सिटी के नाम से मशहूर #कानपुर में #जाजमऊ से #गंगा जी के किनारे किनारे २०-१२ किमी के दायरे में आप घूमने जाएं, तो आपको नाक बंद करनी पड़ेगी,यहाँ सैंकड़ों की तादात में गंगा किनारे भट्टियां धधक रही होती हैं,इन भट्टियों में #जानवरों को काटने के बाद निकली #चर्बी को गलाया जाता है।
इस चर्बी से मुख्यतः ३ चीजें बनती हैं।
१- #एनामिल_पेंट (जिसे हम अपने घरों की दीवारों पर लगाते हैं)
२- # ग्लू ( #फेविकोल इत्यादि,जिन्हें हम कागज़, लकड़ी जोड़ने के काम में लेते हैं )
३- और तीसरी जो सबसे महत्वपूर्ण चीज़ बनती है वो है " #शुध्द_देशी_घी"
जी हाँ " शुध्द देशी घी"
यही देशी घी यहाँ थोक मंडियों में १२० से १५० रूपए किलो तक भरपूर बिकता है,इसे बोलचाल की भाषा में " #पूजा_वाला_घी" बोला जाता है।
इसका सबसे ज़्यादा प्रयोग भंडारे कराने वाले करते हैं,लोग २५ किलो वाला टिन खरीद कर #मंदिरों में दान करके पूण्य कमा रहे हैं।
इस "शुध्द देशी घी" को आप बिलकुल नही पहचान सकते,,बढ़िया रवेदार दिखने वाला ये ज़हर #सुगंध में भी एसेंस की मदद से बेजोड़ होता है।
#औधोगिक क्षेत्र में कोने कोने में फैली #वनस्पति घी बनाने वाली फैक्टरियां भी इस ज़हर को बहुतायत में खरीदती हैं,गांव देहात में लोग इसी वनस्पति घी से बने #लड्डू विवाह शादियों में मज़े से खाते हैं,शादियों पार्टियों में इसी से सब्ज़ी का तड़का लगता है,जो लोग जाने अनजाने ख़ुद को शाकाहारी समझते हैं,जीवन भर मांस अंडा छूते भी नहीं,वो क्या जाने वो जिस शादी में चटपटी सब्ज़ी का लुत्फ़ उठा रहे हैं उसमें आपके किसी पड़ोसी #पशुपालक के कटड़े (भैंस का नर बच्चा) की ही चर्बी वाया कानपुर आपकी सब्ज़ी तक आ पहुंची हो,शाकाहारी व व्रत करने वाले जीवन में कितना बच पाते होंगे अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है।
अब आप स्वयं सोंच लीजिये आप जो #वनस्पति घी " #डालडा" " #फॉर्च्यून" आदि खाते हो उसमे क्या मिलता होगा।
कोई बड़ी बात नही कि देशी घी बेंचने का दावा करने वाली #कम्पनियाँ भी इसे प्रयोग करके अपनी जेब भर रही हैं।
इसलिए ये बहस बेमानी है कि कौन घी को कितने में बेच रहा है,अगर शुध्द घी ही खाना है तो अपने घर में गाय पाल कर ही आप शुद्ध घी खा सकते हैं,या किसी #गाय_भैंस वाले के घर का घी लेकर खाएँ,यही बेहतर होगा..!!
साभार