02/08/2026
"यदि कोई धार्मिक है तो वो कट्टर नहीं होगा
और यदि कोई कट्टरता लिए हैं तो वो धर्मिक हो ही नहीं सकता"
ये कैसी यात्रा?
यात्रा तो अंदर की और करनी थी!
धर्म का अभिप्राय होता है सच और सच केवल एक होता है दो नहीं।
वेदों और अन्य धर्म गर्न्थो में विस्तार से बताया गया है ,धर्म और अधर्म के बारे में।
सरल भाषा में समझें तो
"धार्यते इति धर्म:" जो धारण करने योग्य हो, वही धर्म है।
जो धारण किया जा सके वो तो केवल सच ही है, यही धर्म है, हर किसी के अंदर है, जो हर कोई अपनाना भी चाहता है, यही धर्म की मूल परिभाषा है।
सच धर्म के धारणी को इन मुख्य बातों पर अमल जरूरी है।
-ईमानदार रहना।
-किसी के साथ बुरा व्यवहार न करना।
-हर किसी की मदद के संभव प्रयास करना।
-सभी में ईश्वरीय अंश समझकर ऊंच-नीच वाला भेदभाव न करना।
-न अत्याचार करना, न सहना, और न अत्याचार होते देखकर अनदेखा करना।
तो धर्म एक ही हुआ इसके विपरीत जो भी है वो अधर्म यानि झूठ यानी किसी ऐसी बात की धारणा बना लेना जो अपनी निजी खोज न होकर उसे सुनकर देखकर किसी साहित्य को केवल पढ़कर और बिना सोच समझ कर धारणा बना ली गई हो।पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ पंडित भया न कोय वाली बात हो जाती है।
सच तो हर एक के अंदर है, अंदर का विषय है, सच में जातीय बंधन भी नहीं होता बल्कि हमारी जाति तो केवल मनुष्य है ।
हम सभी मनुष्य जाती से हैं।किसी बन्दर या कुत्त्ता जाति से नहीं हैं।हमारा तथाकथित जातिगत बटवारा तो वोट की खातिर करवाया गया है।जो धर्म विरोधी या राज करने वाला है वो जितने ज्यादा भागों, वर्गों, वर्णो, तथाकथित धर्मों में आपको बांटेगा उतना ही वो राजनीतिक रूप से शक्तिशाली और आपका अपना तंत्र जो जनतंत्र के रूप में है,कमजोर होता जाएगा।
पर हाँ एक सच धर्म होते हुए भी दुनियावी, मायावी संसार के चलते विचार या मति मतान्तर हो सकतें है और विचार भी कई तरह के हो सकते हैं।
विचार, सुविचार, कुविचार विचारों को सीमा में बांधना मूर्खता है।
ये बैठकर चर्चा का विषय हो सकते हैं।गुणीजन मतभिन्नता में आपस में मिल बैठकर समाधान खोज लेते हैं।एकता का यही मन्त्र भी है।
यही एकता वाली बात विरोधी नहीं चाहता।वो आपको इकठ्ठे बैठने के अवसर हॉसिल ही नहीं होने देता।
आज फ़ेसबुक, व्हाट्सअप या जो भी सोशल साधन हैं उनकी एक सीमा है।उस सीमा के बाद आप ज्यादा लोगों तक अपने विचार नहीं ले जा सकते।यानी आप एक साथ वैचारिक एकता कायम न कर सकें इसके लिये जो सच का विरोधी या धर्म का विरोधी है वो अपने व्यर्थ के प्रयास सदियों से करता चला आ रहा है।
मेरा मानना है की जब जब धर्म को राजनीति (राज करने वाली नीति) परिभाषित करेगी तो वो धर्म नहीं रह जायेगा।वो एक विरोधी का हथियार बन जाता है।जो आपको आपकी निजता जो कि धर्म का मूल स्वभाव है उससे रोक लेता है।दुनियां भर के कानून में निजता एक मूलभूत अधिकार है।
तो धर्म एक individual subject है।निजता का विषय है।मेरे मन की बात कोई और परिभाषित करे यह विचार ही निर्मूल है।
मेरा मत बदलने के लिए या तो दवाब डाला जाएगा, मेरे आसपास के दृश्य गढ़े जाएंगे या परिस्थियों को निर्मित किया जाएगा।
परन्तु मेरे अंदर का जो सच है जो धर्म है जो ईश्वरीय अंश है इसको दबाना असम्भव है।
परन्तु कई बार ऎसा होता है कि उस अंतरतम की आवाज़ को झूठ अपनी ताकत के बल पर कुछ समय के लिए मद्दम कर देता है।यदि ऐसा किया जाता है तो फिर सामाजिक ताने बाने में एक परिवर्तन होना शुरू हो जाता है।और वो परिवर्तन सदियों तक अपना प्रभाव छोड़ता है।जिसमें सदियों की मानसिक गुलामी, अत्याचार, और कुप्रथाएं समाज का हिस्सा हो जाती हैं।
वो धर्म कतई नहीं होगा बल्कि एक विचार होगा जिसका मकसद स्वार्थसिद्धि के अलावा और कुछ भी नहीं होगा।
आज हम बाहर की यात्राओं पर मगन होकर उन्मादी होते जा रहे हैं, कट्टर होते जा रहे हैं, यदि कोई धार्मिक है तो वो कट्टर नहीं होगा और यदि कोई कट्टरता लिए हैं तो वो धर्मिक हो ही नहीं सकता।
इसलिए सावधान !सबसे पहले अपने अंदर की और यात्रा करना जिससे आपके शरीर की अंतिमयात्रा ज्यादा आसान हो जाएगी।