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19/08/2026

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“Dhurandhar” सिर्फ एक फिल्म नहीं लगती,ये उन लोगों की आवाज़ लगती है जो रोज़ बहुत कुछ महसूस करते हैं,लेकिन बोल नहीं पाते।क...
08/01/2026

“Dhurandhar” सिर्फ एक फिल्म नहीं लगती,
ये उन लोगों की आवाज़ लगती है जो रोज़ बहुत कुछ महसूस करते हैं,
लेकिन बोल नहीं पाते।

कभी-कभी हम theatre में बैठे होते हैं,
lights बंद होती हैं,
screen पर कहानी शुरू होती है
और अचानक ऐसा लगता है
जैसे कोई हमारी ही ज़िंदगी का हिस्सा दिखा रहा हो।
Dhurandhar के साथ भी कुछ ऐसा ही एहसास होता है।

ये फिल्म शोर मचाकर attention नहीं मांगती।
ना ज़बरदस्ती खुद को great साबित करने की कोशिश करती है।
ये बस अपनी कहानी honestly कहती है।
और जब कोई बात ईमानदारी से कही जाए,
तो वो सीधे दिल तक पहुँचती है।

आज जब इस फिल्म की record breaking collection की बात होती है,
तो बात सिर्फ पैसों की नहीं होती।
उसमें audience का भरोसा भी शामिल होता है।
वो भरोसा, जो धीरे-धीरे cinema से उठता जा रहा था,
क्योंकि कई बार लोगों को लगा
कि उन्हें सिर्फ ticket buyer समझा जा रहा है,
सोचने वाला इंसान नहीं।

Dhurandhar ने वही भरोसा वापस लाने का काम किया।
इस फिल्म का hero perfect नहीं है।
वो थका हुआ है,
कभी गुस्से में है,
कभी system से लड़ते-लड़ते टूट सा जाता है।
और शायद इसी वजह से
लोग उसमें खुद को देख पाते हैं।

इस कहानी में system है,
लेकिन system साफ़ नहीं दिखाया गया।
यहाँ struggle है,
लेकिन कोई magic solution नहीं है।
फिल्म ये वादा नहीं करती
कि सब कुछ एक ही दिन में ठीक हो जाएगा।
ये बस इतना कहती है
कि जब तक सवाल पूछने वाले लोग ज़िंदा हैं,
उम्मीद भी ज़िंदा रहती है।

Film industry का एक कड़वा सच ये भी है
कि कई बार content से ज़्यादा marketing पर भरोसा किया जाता है।
Emotion से ज़्यादा noise create किया जाता है।
लेकिन Dhurandhar ने बिना ज़्यादा promotion के दिखा दिया
कि अगर कहानी सच्ची हो,
तो audience खुद उसका promotion बन जाती है।

इस फिल्म की success
सिर्फ box office numbers में नहीं दिखती।
ये उन बातों में दिखती है
जो movie खत्म होने के बाद लोग आपस में करते हैं।
ये उन खामोश पलों में दिखती है
जब film देखकर इंसान थोड़ी देर चुप हो जाता है।

सबसे अच्छी बात ये है
कि Dhurandhar हमें याद दिलाती है
कि हम आज भी feel कर सकते हैं,
आज भी सही-गलत समझ सकते हैं,
और आज भी सिर्फ entertainment नहीं,
बल्कि meaning ढूंढने cinema जा सकते हैं।

शायद इसी वजह से ये फिल्म चल रही है।
शायद इसी वजह से लोग इसे सिर्फ देख नहीं रहे,
बल्कि महसूस कर रहे हैं।

और जब कोई फिल्म
audience को महसूस करने पर मजबूर कर दे,
तो वो सिर्फ hit नहीं होती,
वो याद बन जाती है।

Dhurandhar शायद वही याद बन रही है।








हम सोचते बहुत हैं…इतना कि सोचते-सोचते थक जाते हैं,और थकान में कुछ करने की ताक़त ही नहीं बचती।मन रोज़ नए सपने बनाता है,नई...
07/01/2026

हम सोचते बहुत हैं…
इतना कि सोचते-सोचते थक जाते हैं,
और थकान में कुछ करने की ताक़त ही नहीं बचती।
मन रोज़ नए सपने बनाता है,
नई कहानियाँ लिखता है,
पर हक़ीक़त की कॉपी अक्सर खाली ही रह जाती है।
हम कहते हैं —
“समय नहीं है”
“मौका नहीं मिला”
“हालात सही नहीं हैं”
पर सच ये है कि
हमने खुद को ही सबसे ज़्यादा समझाया है,
और खुद से ही सबसे ज़्यादा झूठ बोला है।
हम एक ऐसी दौड़ में भाग रहे हैं
जहाँ सब दौड़ रहे हैं,
पर कोई नहीं जानता क्यों।
जहाँ अंत तो तय है,
पर उस अंत तक पहुँचते-पहुँचते
हम क्या खो देंगे —
इसकी कोई गिनती नहीं करता।
कड़वी बात सुनोगे?
हम अपने सपनों से ज़्यादा
लोगों की राय से डरते हैं।
हम अपनी खुशियों से पहले
समाज की सुविधा देखते हैं।
और मीठी बात ये है कि
ज़िंदगी अब भी हमें मौका देती है,
हर सुबह बिना शिकायत के।
एक दिन नहीं,
पूरा जीवन बदलने की ज़रूरत नहीं है।
बस आज
एक छोटा-सा कदम,
एक अधूरा डर,
एक टला हुआ फैसला पूरा कर लो।
क्योंकि जो लोग “एक दिन” के भरोसे जीते हैं,
उनका एक दिन कभी नहीं आता।
ज़िंदगी समझदारी नहीं माँगती,
ज़िंदगी हिम्मत माँगती है।
गलतियाँ करने की हिम्मत,
रुक जाने की हिम्मत,
और ज़रूरत पड़े तो
फिर से शुरू करने की हिम्मत।
कम सोचो,
ज़्यादा महसूस करो।
थोड़ा डरो,
पर रुकना मत।
क्योंकि अंत चाहे जैसा भी हो,
ये सफ़र तुम्हारा होना चाहिए,
किसी और की उम्मीदों का नहीं।
आज नहीं जिए,
तो कल बस कहानी रह जाएगी…
और कहानियाँ
खुद नहीं लिखी जातीं। ✨

Sukriya - Dil Se ❤️

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सौरभ द्विवेदी का दि लल्लनटॉप और इंडिया टुडे ग्रुप से जाना एक व्यक्ति के जाने भर की खबर नहीं है। यह घटना हमें मीडिया की उ...
06/01/2026

सौरभ द्विवेदी का दि लल्लनटॉप और इंडिया टुडे ग्रुप से जाना एक व्यक्ति के जाने भर की खबर नहीं है। यह घटना हमें मीडिया की उस सच्चाई से फिर रूबरू कराती है, जिसे हम जानते तो हैं, लेकिन अक्सर स्वीकार नहीं करते।

हर बड़ा मीडिया संस्थान चाहता है कि उसका ब्रांड सबसे ऊपर रहे। चेहरे आएँ, पहचान बनाएँ, काम करें और फिर बदल जाएँ — संस्थान चलता रहे। वहीं हर रचनात्मक व्यक्ति धीरे-धीरे अपनी आवाज़, अपनी भाषा और अपने नज़रिए के साथ ख़ुद को पहचानने लगता है। जब ये दोनों धाराएँ टकराती हैं, तो अलगाव तय हो जाता है।

दि लल्लनटॉप की पहचान सिर्फ़ एक डिजिटल प्लेटफॉर्म की नहीं थी। उसकी भाषा, उसकी सहजता, उसका ठेठपन और उसकी बेबाकी सौरभ द्विवेदी की सोच से बनी थी। इसलिए यह स्वाभाविक है कि बहुत से दर्शकों के लिए दि लल्लनटॉप और सौरभ द्विवेदी एक-दूसरे से अलग होकर सोचना मुश्किल हो रहा है।

लेकिन यह भी उतना ही सच है कि संस्थान कभी भावनाओं से नहीं, रणनीति से चलते हैं। वे किसी एक चेहरे पर टिक कर नहीं रुकते। इतिहास गवाह है कि आजतक से लेकर दि लल्लनटॉप तक, लोग आते-जाते रहे हैं और ब्रांड आगे बढ़ता रहा है।

सौरभ द्विवेदी का सबसे बड़ा योगदान शायद यह रहा कि उन्होंने हजारों युवाओं को यह भरोसा दिया कि भाषा, किताबें और गंभीर सोच अब भी बेकार नहीं हुई है। उन्होंने यह एहसास कराया कि अगर नीयत साफ़ हो और मेहनत ईमानदार, तो डिजिटल शोर के बीच भी सार्थक पत्रकारिता की जगह बन सकती है।

हां, समय के साथ स्टाइल, पहचान और लोकप्रियता कई बार व्यक्ति पर हावी भी होती है। यह हर उस इंसान के साथ होता है जो लंबे समय तक लाइमलाइट में रहता है। लेकिन इससे उसके काम का महत्व कम नहीं हो जाता।

अब सबसे ज़रूरी सवाल यह नहीं है कि दि लल्लनटॉप बिना सौरभ द्विवेदी के कैसा होगा, बल्कि यह है कि सौरभ द्विवेदी आगे क्या रचते हैं। उम्मीद यही है कि उनका अगला सफ़र उन्हें पत्रकारिता से दूर नहीं ले जाएगा, बल्कि और अधिक स्वतंत्र, जिम्मेदार और गहराई से भरा होगा।

अंत में यही कहा जा सकता है—
प्लेटफॉर्म बड़े होते हैं, लेकिन विचार उनसे भी बड़े होते हैं।
और जिनके पास कहने को कुछ होता है, उनकी आवाज़ किसी न किसी रूप में ज़रूर लौटती है।

शुभकामनाएं।


कोई आदमी अपने काम में मस्त है।काम करते हुए गुनगुना लेता है, हँस लेता है, अपने दोस्तों में खुश रहता है।उसे न फेम चाहिए, न...
05/01/2026

कोई आदमी अपने काम में मस्त है।
काम करते हुए गुनगुना लेता है, हँस लेता है, अपने दोस्तों में खुश रहता है।
उसे न फेम चाहिए, न पैसे, न पहचान।

फिर किसी दिन उसकी एक वीडियो चल जाती है।

लोग कहते हैं –
“अरे मज़ेदार है, एक बार और गा दे”
“बीस रुपए ले, फिर से बोल”

शुरू में उसे भी अच्छा लगता है।
किसे अच्छा नहीं लगेगा?
कोई तारीफ़ करे, वीडियो बनाए।

लेकिन दिक्कत वहाँ शुरू होती है जहाँ लोग रुकते नहीं।

---

अब रोज़ वही लोग आने लगते हैं।
हर कोई कैमरा लेकर।
हर कोई वही गाना, वही डायलॉग चाहता है।

वह आदमी थक जाता है।

मन नहीं करता, फिर भी दबाव

काम छोड़कर कैमरे झेलना

हर वक्त लोग, शोर, मज़ाक

धीरे-धीरे वह चिड़चिड़ा हो जाता है।
भागने लगता है।
गालियाँ देता है।
पैसे फेंक देता है।

और तब वही लोग कहते हैं –
“देखो, पागल हो गया”
“घमंडी है”
“फेम हजम नहीं हुई”

---

अब सच्चाई क्या है?

सच्चाई ये है कि
वह फेम के लायक बना ही नहीं था,
और यह उसकी गलती नहीं थी।

हर इंसान की अपनी दुनिया होती है।

किसी को खेत में मज़ा आता है

किसी को किताबों में

किसी को दोस्तों के साथ हँसने में

सबको स्टेज पर नहीं खड़ा किया जा सकता।

---

जैसे— एक गाँव का सीधा आदमी
अगर शहर के बड़े महल में रख दिया जाए
तो क्या वह खुश रहेगा?

नहीं।

उसी तरह
जो आदमी अपनी गली में खुश था
वह कैमरों की भीड़ में टूट जाता है।

---

सोशल मीडिया की सबसे बड़ी गलती क्या है?

यह इंसान नहीं देखता,
सिर्फ कंटेंट देखता है।

आज सिर पर बैठाओ,
कल गिराकर मज़ाक उड़ाओ।

यही रानू मंडल के साथ हुआ,
मोनालिसा के साथ हुआ,
ढाबे वाले बुज़ुर्ग के साथ हुआ,
और अब इस लड़के के साथ।

---

सीधी बात

वायरल होना हर किसी के लिए अच्छा नहीं होता।
कुछ लोगों के लिए यह खुशी नहीं, सज़ा बन जाता है।

हर हँसता चेहरा
हमारा मनोरंजन बनने के लिए नहीं होता।

अगर यह बात हम समझ गए,
तो शायद अगला “धूम” टूटने से बच जाए।

बस इतनी ही सी बात है।

🎉 HAPPY NEW YEAR 2026! 🎉A new year means new opportunities, new goals, and a stronger version of YOU.2025 taught us less...
31/12/2025

🎉 HAPPY NEW YEAR 2026! 🎉

A new year means new opportunities, new goals, and a stronger version of YOU.

2025 taught us lessons.
2026 will give us results.

Let’s promise ourselves:
📌 No more excuses
📌 No more fear
📌 Only growth, discipline & success

Because your growth is my passion — and this year, we grow together. 🚀

Wishing you health, success, clarity, and the courage to chase your dreams.
Make 2026 your breakthrough year. 💫

— Shambhu Kumar

Is there any dream that comes without pain?Success never begins with comfort.When your struggle is connected to a bigger...
23/12/2025

Is there any dream that comes without pain?
Success never begins with comfort.
When your struggle is connected to a bigger purpose,
that pain slowly turns into strength.
Don’t quit—your dream is worth it.
Link- https://youtu.be/cu1WPCNNBtQ








Preparing for an MIS Executive Interview?I’ve shared the Top 10 MIS Interview Questions and Answers that every fresher m...
05/12/2025

Preparing for an MIS Executive Interview?
I’ve shared the Top 10 MIS Interview Questions and Answers that every fresher must know — including Excel-based questions that interviewers ask in almost every MIS interview.

Link - https://youtu.be/pSzOzAKP6nw

Whether you're switching from an agent role to MIS or starting your career fresh, these questions will help you build confidence and answer professionally.
Don’t forget to save this for your next interview! 🚀📊

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