27/04/2026
हमारे समाज में त्याग की परिभाषा बड़ी लचीली हो गई है।
कुछ लोग अपने सपनों का त्याग करते हैं,
और कुछ लोग… अपने बच्चों का।
नेता जी भी बड़े त्यागी निकले।
देश-समाज की सेवा के नाम पर उन्होंने इतना बड़ा दिल दिखाया
कि अपने बेटे की जिंदगी तक दांव पर लगा दी—
ताकि उनका राजनीतिक कद थोड़ा और ऊँचा दिख सके।
कहते हैं, “बच्चे हमारे भविष्य होते हैं।”
पर नेता जी के यहाँ भविष्य नहीं,
“प्रोजेक्ट” तैयार होते हैं।
जहाँ बचपन नहीं पनपता,
बल्कि “इमेज” तैयार होती है।
बेटा क्या चाहता है, उसे क्या पसंद है—
ये सवाल उनके एजेंडा में कभी आए ही नहीं।
उनके लिए सबसे जरूरी था—
भीड़ में एक और चेहरा,
जो उनके नारे को थोड़ा और ज़ोर से दोहरा सके।
मजेदार बात यह है कि मंच पर खड़े होकर
वो बड़े गर्व से कहते हैं—
“मैं अपने परिवार का भी बलिदान देने को तैयार हूँ…”
और भीड़ तालियाँ बजाती है,
जैसे किसी ने बहुत बड़ा त्याग कर दिया हो।
पर कोई ये नहीं पूछता—
जिसका बलिदान दिया जा रहा है,
उसकी सहमति भी है या नहीं?
राजनीति जब सेवा से ज्यादा स्वार्थ बन जाए,
तो सबसे पहले घर ही उसकी चपेट में आता है।
और तब “नेता” बड़ा होता जाता है,
पर “पिता” कहीं छोटा पड़ जाता है।
आखिर में सवाल यही है—
देश को एक अच्छा नेता मिल भी जाए,
पर क्या उस बच्चे को उसका अपना जीवन वापस मिल पाएगा?