10/02/2023
ऋषियों की अमृत वाणी
ओ३म्
शंका - समाधान
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शंका :- पूजा किसे कहते हैं ?
समाधान. किसी वस्तु का सम्मान कर , उससे यथायोग्य लाभ लेना ' पूजा ' है ।
शंका :- ईश्वर पूजा किसे कहते हैं ?
समा . ईश्वर के उपदेशों का पालन कर ज्ञान व आनन्द लेना । ' ईश्वर की पूजा ' या ' ईश्वरभक्ति ' करना कहलाती है ।
शंका :- ईश्वरभक्ति की क्या विधि है ?
समा . ईश्वर के तुल्य अपने गुण - कर्म - स्वभाव को बनाना ।
शंका :- इश्वरभक्ति के क्या लाभ हैं ?
समा , आत्मबल की प्राप्ति , पूर्ण सुख - शांति व ईश्वर की प्राप्ति ।
शंका :- क्या ईश्वर की मूर्ति पर फल - फूल चढ़ाकर पूजा नहीं कर सकते ?
समाधान - नहीं, मूर्ति जड़ है । ईश्वर चेतन व निराकार है उस पर फल - फल , जलादि नहीं चढ़ सकते ।
शंका :- ईश्वर की मूर्ति जड़ नहीं होती , पुजारी उसमें प्राणप्रतिष्ठा कर देते हैं , तब क्या दोष है ?
समाधान - ये प्राणप्रतिष्ठा नहीं , पाखंडप्रतिष्ठा है क्योंकि प्राणप्रतिष्ठा के बाद भी मूर्ति जीवित - चेतन नहीं होती ।
शंका :- जो बच्चों के समान ईश्वर का सही स्वरूप नहीं जानते क्या उनके लिए मूर्तिपूजा ठीक नहीं हैं ?
समाधान - नहीं , बच्चों को शुरु में २×८ = १६ सिखाते हैं या २×८ = ८ ? , २×८ =१६ ही ना । तब गणित के समान विद्या - विज्ञान के दाता ईश्वर के स्वरूप को ही ठीक न सीखना व सिखाना महापाप , महाअन्याय है।
शंका :- क्या मूर्तिपूजा ईश्वरप्राप्ति का साधन नहीं है , जैसे - सेवकों के माध्यम से प्रधानमंत्री से मिलते हैं ?
समा - नहीं , क्योंकि सेवक चेतन , ज्ञानी है वह प्रधानमंत्री से मिला सकता है , लेकिन मूर्ति तो ज्ञानहीन जड़ है , वह न बोल सकती है न चल सकती है इसलिए ईश्वर से नहीं मिला सकती।
शंका :- जी , ये तो श्रद्धा का विषय है ' जैसी भावना वैसा भगवान का रूप ' , ठीक है ना ?
समा. नहीं , ये अश्रद्धा है। श्रद्धा का अर्थ है 'सत्य को स्वीकार करना' जिसका आधार है तर्क व प्रमाण।
शंका :- ईश्वर तो एक व निराकार ही है उसके रूप अनेक हैं , तब मूर्तिपूजा में क्या दोष है ?
समा. दोष ये है कि ' निराकार वस्तु के अनेक रूप ' का उदाहरण संसार में कोई नहीं दिखा सकता ।
शंका क्या कलियुग में मूर्तिपूजा ही ईश्वर की पूजा नहीं है ?
समा . नहीं , क्योंकि कलियुग में सूर्य को सूर्य ही मानते हैं अत : कलियुग में ईश्वर को मूर्ति मानना अविद्या है।
शंका :- ऐसी कौन सी वस्तु है जिसमें ईश्वर नहीं है ?
समा . कोई नहीं , ईश्वर कण - कण में है।
शंका :- कण - कण में है तो मूर्ति में ईश्वर क्यों नहीं है ?
समा. सर्वव्यापक होने से मूर्ति में भी है। मूर्ति में ईश्वर हैं परंतु मूर्ति ईश्वर नही है
शंका :- जब मूर्ति में भी ईश्वर है तो मूर्तिपूजा का खंडन क्यों ?
समा. क्योंकि जड़ मूर्ति में ईश्वर के समान ज्ञान , बल व सर्वज्ञता आदि गुण नहीं हैं। मूर्तियां सब काल्पनिक हैं मूतियों चित्रों का सम्मान करना चाहिए और महापुरुषों के सच्चे चरित्र को धारण करना कराना ही श्रेष्ठ कर हैं।
शंका :- मूर्तिपूजा तो लोग ईश्वर के अवतारों की करते हैं , इसलिए कोई दोष नहीं है।
समा . दोष है , अवतार कहते हैं ' उतरने को ' । सर्वव्यापक होने से ईश्वर का आना - जाना असंभव है।
शंका :- ईश्वर अवतार न ले तो पापियों का नाश कैसे करेगा ?
समा . जैसे - बिना जन्म लिए ईश्वर पापियों के शरीर बना देता है , वैसे ही नष्ट भी कर सकता है।
शंका :- क्या ईश्वर चौथे , सातवें आसमान या बैकंठधाम में नहीं बैठा है ?
समाधान- नहीं , अनन्त ईश्वर का तिलभर के संसार या स्थान विशेष में रहना संभव नहीं है।
शंका :- ईश्वर भक्तों के दुःख दूर कैसे करता है ?
समा . अपने भक्तों को ज्ञान , बल व सामर्थ्य देकर।
शंका :- जन्म लेने से ईश्वर में क्या दोष आते हैं ?
समा . जन्म लेने से ईश्वर : - सर्वज्ञ से अल्पज्ञ , सर्वत्र से एकत्र , स्वतंत्र से परतंत्र , निराकार से साकार , निर्विकार से विकारी और पवित्र से अपवित्र हो जाएगा।
शंका :- मूर्ति से ईश्वर की याद व ध्यान होता है , इसलिए मूर्तिपूजा में दोष नहीं है ?
समाधान- ये सत्य नहीं। इतने विशाल ब्रह्मांड , सूर्य , चंद्रमा , पहाड व शरीर की रचना को देखकर जिसका ईश्वर की याद अथवा ध्यान नहीं होता , उसका मानवकृत मूर्ति में भी ईश्वर का ध्यान नहीं लगेगा ।
शंका :- निराकार ईश्वर का दर्शन या साक्षात्कार किसे कहते हैं ?
समा . ईश्वर के ज्ञान , बल व आनन्दादि की अनुभूति होने को ही ' दर्शन ' या ' साक्षात्कार ' कहते हैं।
शंका :- ईश्वर का साक्षात्कार कौन कर सकता है ?
समा . ईश्वर का उपासक , वेदों का विद्वान , धर्मात्मा - मुमुक्षु , योगी संन्यासी।
शंका :- सच्चे आस्तिक की क्या पहचान होती है ?
समा-
१. सच्चा आस्तिक सदैव निर्भय , प्रसन्न रहता है। २. भौतिक सुखों में आकर्षित नहीं होता ।
३. सब प्राणियों से आत्मवत् व्यवहार करता है।
४. वेदानुसार निष्काम कर्म करता है।
शंका :- सभी मत - सम्प्रदाय ईश्वर के प्रतीक पूजते हैं , क्या बहुमत से मूर्तिपूजा सत्य सिद्ध नहीं होती ?
समाधान- सत्य का निर्णय तर्क व प्रमाणों से होता है बहुमत से नहीं , जैसे - एक सूर्य तमनाशक है , अनंततारे नहीं।
शंका :- प्रमाण किसे कहते हैं ?
समाधान - किसी पदार्थ का सत्यस्वरूप जिस साधन से जाना जाए या निश्चय किया जाए वह 'प्रमाण' है।
शंका :- तर्क किसे कहते हैं ?
समा . किसी कारण को देखकर किसी विषय में विचार करना , कि यह वस्तु ऐसी होनी चाहिए यह ' तर्क है।
शंका :- मूर्ति किसे कहते हैं ?
समाधान- जिसमें रूप - रंग व आकार हो , उसे ' मूर्ति ' कहते हैं।
शंका :- क्या मनुष्य भी मूर्ति है ?
समाधान , हाँ , मनुष्य भी चेतन मूर्ति है।
शंका :- मूर्ति कितने प्रकार की होती है ?
समाधान , दो - जड़ मूर्ति व चेतन मूर्ति।
शंका :- जड़ मूर्तियां कौन सी हैं ?
समा . पृथ्वी , सूर्य , पहाड़ , कार , मोबाईल आदि।
शंका :- चेतन मूर्तियां कौन सी हैं ?
समा . माता-पिता , शिक्षक , अतिथि आदि देवता।
शंका :- जड़ मूर्तिपूजा कैसे करते हैं ?
समा . ईश्वर रचित पृथ्वी , जल , सूर्यादि और मनुष्य रचित घर , कार , मोबाइलादि जड पदार्थों का रख - रखाव व उनका बुद्धिपूर्वक उपयोग लेकर सुखी होना ' जड़ मूर्तिपूजा ' है।
शंका :- चेतन मूर्तिपूजा की विधि क्या है ?
समाधान- माता - पिता , आचार्य , विद्वानादि पालनकर्ता लोगों से विद्या - सुशिक्षा लेना । उनकी आज्ञा का पालन करना । उनके प्रति निंदा , हिंसा , कटुवचन न बोलना । तन , मन व धन से उनकी सेवा , रक्षा करना 'चेतन मूर्तिपूजा' कहलाती है।
शंका :- ईश्वर की मूर्ति नहीं होती , क्या वेदों में इसका प्रमाण है ?
समा . हाँ , ' न तस्य प्रतिमाऽस्ति ' यजुर्वेद ३२.३ अर्थात् ' ईश्वर की प्रतिमा - मूर्ति नहीं होती । '
शंका :- लोग सर्वव्यापक , निराकार , ईश्वर की मूर्तिपूजा क्यों करते हैं ?
समा . अपनी अज्ञानता , अविद्या , हठ - दुराग्रह , स्वार्थ , भय और गलत सीखने - सिखाने से ।
शंका :- क्या श्रीराम ने रामेश्वरम् में महादेव की मूर्ति स्थापित कर पूजा नहीं की थी ?
समाधान - नहीं की । देखो - 'अत्र पूर्व महादेवः प्रसादमकरोत् विभुः' अर्थात् _ _ _ हे सीते ! यह वह स्थान है जहां पर विभु अर्थात् सर्वव्यापक महादेव ईश्वर ने हम पर कृपा की थी । अत : 'विभु' होने से महादेव की मर्ति पूजा स्वयं असिद्धि हो गई ।
ये वाल्मीकि रामायण युद्ध कांड में आया हैं वहां किसी तरह की लिंग स्थापना और पूजा का वर्णन नहीं है
श्रीराम सीता जी से कहने लगे पुष्पक विमान में बैठे हुए बोले हे वैदेही यह वही जगह है जहां बैठकर हम देवों के देव महादेव अर्थात परमपिता परमात्मा की उपासना किया करते थे
शंका :- क्या सच्ची प्रार्थना व समर्पण से ईश्वर हमारे पाप क्षमा कर देता है ?
समाधान - नहीं , सच्ची प्रार्थना से दयालु प्रभु हमें पाप से बचने व दु:ख सहने की महानशक्ति देता है।
शंका :- ईश्वर दयालु है तो हमारे पाप क्षमा क्यों नहीं करता ?
समाधान - इसलिए कि -
१ . क्षमा करने से सुधार कभी नहीं होता ।
२ . वह दयालु है, हमें पापों से बचाना चाहता है। ३ . ईश्वर न्यायकारी है , जैसा कर्म वैसा फल ।
४ . कर्मफल न देने से ईश्वर अन्यायकारी होता है
शंका :- क्या कोई धर्मगुरु आदि हमारे पाप कर्मों को अपने उपर ले सकता हैं ?
समा , नहीं ले सकता । अपने किए कर्मों का फल करोड़ जन्म लेकर भी स्वयं ही भोगना पड़ता है।
शंका :- कुछ महापुरुष दुष्टों के पाप कर्मों को क्षमा कर देते हैं , क्या ये सत्य है ?
समा . नहीं , अपितु महापुरुष दुष्टों के अन्याय को सह लेते हैं , द्वेष नहीं करते , यही क्षमा का अर्थ है।
शंका :- जी , क्या तीर्थ , मन्दिर , पीर - दरगाह और सैयद जाने से पाप नहीं छूटते ?
समा . नहीं , पापों का नाश तो ईश्वर भक्ति , योगाभ्यास , सत्यभाषण और परोपकारादि से होता है।
शंका :- प्रायश्चित किसे कहते हैं ?
समा . किए गए पाप कर्मों के प्रति घृणा - ग्लानि व कुछ कष्ट भोगने के भाव को ' प्रायश्चित ' कहते हैं।
शंका :- प्रार्थना से पाप क्षमा हो जाते हैं , इस भ्रम का क्या कारण है ?
समाधान- कुछ स्वार्थी पंडे - पुजारी , कथावाचक , झूठे धर्मगुरु , ज्योतिषी व अज्ञान - अविद्या ।
शंका :- सब शंकाओं का समाधान व विद्याओं का मूल कारण क्या है ?
समा . ' ईश्वर ' व उसकी दी गई ' वेद विद्या ' ।
शंका :- पूजाघरों में रखी मूर्तियां ईश्वर की नहीं है तो फिर किसकी हैं ?
समा . कुछ तो पूर्वज महापुरुषों की हैं और कुछ काल्पनिक निराधार हैं।
शंका :- क्या धार्मिक , सत्यवादी , देशभक्तों , महापुरुषों के चित्र या मूर्ति घर में रख सकते हैं ? समाधान- हॉ , अवश्य रखें । उनके जीवन से शिक्षा ग्रहण करें और अपने जीवन को भी महान बनाए लेकिन अप्रामाणिक , विज्ञान विरुद्ध चित्र न रखें। प्रामाणिक चित्र रखें व उनकी सुरक्षा भी करें।
शंका :- परमेश्वर की भक्ति न करने से क्या हानि हो सकती है ?
समा . ईश्वर भक्तिहीन कभी भी पाप कर्मों से छुटकर सुख - शांति प्राप्त नहीं कर सकता ।
शंका :- संसार में परमपूज्य और धारण करने योग्य देवता कौन है ?
समा . 'परमपिता परमेश्वर' ।
शंका :- मनुष्य के जीवन का मुख्य उद्देश्य क्या है ?
समाधान- 'परमेश्वर की प्राप्ति, मोक्ष की प्राप्ति'।
हमारा दोष ये हैं की हमारी सुई राम चरित मानस भागवत आदि १८ पुराणों पर रुकी हुई हैं हम उससे ऊपर चले तो सत्य की सच्ची जानकारी प्राप्त करे जैसे वाल्मीकि रामायण महाभारत शास्त्र उपनिषद मनु स्मृति वेद आदि वैदिक साहित्य को पढ़े ( टीवी वाली रामायण महाभारत देखने से सत्य असत्य का ज्ञान कभी नही होगा ये धर्म ग्रंथ के हिस्से भी नही हैं ) तभी सत्य असत्य का पता लगेगा
पिछले २५०० वर्षों में आर्यावर्त २४ बार विभाजित हो चुका हैं कारण वही सत्य अर्थात धर्म की रक्षा न होने के कारण ।
आज का वेद मंत्र
ओ३म् शं नो धाता शमु धर्त्ता नो अस्तु शं न उरूची भवतु स्वधाभि:। शं रोदसी बृहती शं नो अद्रि: शं नो देवानां सुहवानि सन्तु ।( ऋग्वेद ७|३५|३)
अर्थ:- सबका पोषण तथा धारण करने हारा परमात्मा हमारे लिए शान्तिदायक हो, पृथ्वी अमृतमय अन्नादि पदार्थों के साथ शान्ति देने वाली हो, विस्तृत अन्तरिक्ष एवं भूमि हमारे लिए शान्तिकारक हो, मेघ व पर्वत हमें शान्ति देने वाले हो और देवों- विद्वानों के सुन्दर स्तुति ज्ञान हमारे लिए शान्तिदायक हो
आओ वेदों की ओर लौटें
जो वेदों की निन्दा करता हैं नही मानता हैं वही नास्तिक हैं
सत्य असत्य के निर्णय हेतु सत्यार्थ प्रकाश पढ़े पढ़ाए
अपने सत्य इतिहास और संस्कृति को जानने के लिए youtube चैनल ज्ञान मंजूषा जेठालाल को सर्च करे subscribe करे अति कृपा होगी
आर्यसमाज जय आर्यावर्त
सत्य सनातन वैदिक धर्म
प्रस्तुत कर्ता जेठालाल विश्वकर्मा आर्य अलीपुर दिल्ली ९८११८६१९३२