Jp Sharma

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ऋषियों की अमृत वाणीओ३म् शंका  - समाधान===============              शंका :-  पूजा किसे कहते हैं ?समाधान. किसी वस्तु का सम...
10/02/2023

ऋषियों की अमृत वाणी

ओ३म्

शंका - समाधान
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शंका :- पूजा किसे कहते हैं ?

समाधान. किसी वस्तु का सम्मान कर , उससे यथायोग्य लाभ लेना ' पूजा ' है ।

शंका :- ईश्वर पूजा किसे कहते हैं ?

समा . ईश्वर के उपदेशों का पालन कर ज्ञान व आनन्द लेना । ' ईश्वर की पूजा ' या ' ईश्वरभक्ति ' करना कहलाती है ।

शंका :- ईश्वरभक्ति की क्या विधि है ?

समा . ईश्वर के तुल्य अपने गुण - कर्म - स्वभाव को बनाना ।

शंका :- इश्वरभक्ति के क्या लाभ हैं ?

समा , आत्मबल की प्राप्ति , पूर्ण सुख - शांति व ईश्वर की प्राप्ति ।

शंका :- क्या ईश्वर की मूर्ति पर फल - फूल चढ़ाकर पूजा नहीं कर सकते ?

समाधान - नहीं, मूर्ति जड़ है । ईश्वर चेतन व निराकार है उस पर फल - फल , जलादि नहीं चढ़ सकते ।

शंका :- ईश्वर की मूर्ति जड़ नहीं होती , पुजारी उसमें प्राणप्रतिष्ठा कर देते हैं , तब क्या दोष है ?

समाधान - ये प्राणप्रतिष्ठा नहीं , पाखंडप्रतिष्ठा है क्योंकि प्राणप्रतिष्ठा के बाद भी मूर्ति जीवित - चेतन नहीं होती ।

शंका :- जो बच्चों के समान ईश्वर का सही स्वरूप नहीं जानते क्या उनके लिए मूर्तिपूजा ठीक नहीं हैं ?

समाधान - नहीं , बच्चों को शुरु में २×८ = १६ सिखाते हैं या २×८ = ८ ? , २×८ =१६ ही ना । तब गणित के समान विद्या - विज्ञान के दाता ईश्वर के स्वरूप को ही ठीक न सीखना व सिखाना महापाप , महाअन्याय है।

शंका :- क्या मूर्तिपूजा ईश्वरप्राप्ति का साधन नहीं है , जैसे - सेवकों के माध्यम से प्रधानमंत्री से मिलते हैं ?

समा - नहीं , क्योंकि सेवक चेतन , ज्ञानी है वह प्रधानमंत्री से मिला सकता है , लेकिन मूर्ति तो ज्ञानहीन जड़ है , वह न बोल सकती है न चल सकती है इसलिए ईश्वर से नहीं मिला सकती।

शंका :- जी , ये तो श्रद्धा का विषय है ' जैसी भावना वैसा भगवान का रूप ' , ठीक है ना ?

समा. नहीं , ये अश्रद्धा है। श्रद्धा का अर्थ है 'सत्य को स्वीकार करना' जिसका आधार है तर्क व प्रमाण।

शंका :- ईश्वर तो एक व निराकार ही है उसके रूप अनेक हैं , तब मूर्तिपूजा में क्या दोष है ?

समा. दोष ये है कि ' निराकार वस्तु के अनेक रूप ' का उदाहरण संसार में कोई नहीं दिखा सकता ।

शंका क्या कलियुग में मूर्तिपूजा ही ईश्वर की पूजा नहीं है ?

समा . नहीं , क्योंकि कलियुग में सूर्य को सूर्य ही मानते हैं अत : कलियुग में ईश्वर को मूर्ति मानना अविद्या है।

शंका :- ऐसी कौन सी वस्तु है जिसमें ईश्वर नहीं है ?

समा . कोई नहीं , ईश्वर कण - कण में है।

शंका :- कण - कण में है तो मूर्ति में ईश्वर क्यों नहीं है ?

समा. सर्वव्यापक होने से मूर्ति में भी है। मूर्ति में ईश्वर हैं परंतु मूर्ति ईश्वर नही है

शंका :- जब मूर्ति में भी ईश्वर है तो मूर्तिपूजा का खंडन क्यों ?

समा. क्योंकि जड़ मूर्ति में ईश्वर के समान ज्ञान , बल व सर्वज्ञता आदि गुण नहीं हैं। मूर्तियां सब काल्पनिक हैं मूतियों चित्रों का सम्मान करना चाहिए और महापुरुषों के सच्चे चरित्र को धारण करना कराना ही श्रेष्ठ कर हैं।

शंका :- मूर्तिपूजा तो लोग ईश्वर के अवतारों की करते हैं , इसलिए कोई दोष नहीं है।

समा . दोष है , अवतार कहते हैं ' उतरने को ' । सर्वव्यापक होने से ईश्वर का आना - जाना असंभव है।

शंका :- ईश्वर अवतार न ले तो पापियों का नाश कैसे करेगा ?

समा . जैसे - बिना जन्म लिए ईश्वर पापियों के शरीर बना देता है , वैसे ही नष्ट भी कर सकता है।

शंका :- क्या ईश्वर चौथे , सातवें आसमान या बैकंठधाम में नहीं बैठा है ?

समाधान- नहीं , अनन्त ईश्वर का तिलभर के संसार या स्थान विशेष में रहना संभव नहीं है।

शंका :- ईश्वर भक्तों के दुःख दूर कैसे करता है ?

समा . अपने भक्तों को ज्ञान , बल व सामर्थ्य देकर।

शंका :- जन्म लेने से ईश्वर में क्या दोष आते हैं ?

समा . जन्म लेने से ईश्वर : - सर्वज्ञ से अल्पज्ञ , सर्वत्र से एकत्र , स्वतंत्र से परतंत्र , निराकार से साकार , निर्विकार से विकारी और पवित्र से अपवित्र हो जाएगा।

शंका :- मूर्ति से ईश्वर की याद व ध्यान होता है , इसलिए मूर्तिपूजा में दोष नहीं है ?

समाधान- ये सत्य नहीं। इतने विशाल ब्रह्मांड , सूर्य , चंद्रमा , पहाड व शरीर की रचना को देखकर जिसका ईश्वर की याद अथवा ध्यान नहीं होता , उसका मानवकृत मूर्ति में भी ईश्वर का ध्यान नहीं लगेगा ।

शंका :- निराकार ईश्वर का दर्शन या साक्षात्कार किसे कहते हैं ?

समा . ईश्वर के ज्ञान , बल व आनन्दादि की अनुभूति होने को ही ' दर्शन ' या ' साक्षात्कार ' कहते हैं।

शंका :- ईश्वर का साक्षात्कार कौन कर सकता है ?

समा . ईश्वर का उपासक , वेदों का विद्वान , धर्मात्मा - मुमुक्षु , योगी संन्यासी।

शंका :- सच्चे आस्तिक की क्या पहचान होती है ?

समा-
१. सच्चा आस्तिक सदैव निर्भय , प्रसन्न रहता है। २. भौतिक सुखों में आकर्षित नहीं होता ।
३. सब प्राणियों से आत्मवत् व्यवहार करता है।
४. वेदानुसार निष्काम कर्म करता है।

शंका :- सभी मत - सम्प्रदाय ईश्वर के प्रतीक पूजते हैं , क्या बहुमत से मूर्तिपूजा सत्य सिद्ध नहीं होती ?

समाधान- सत्य का निर्णय तर्क व प्रमाणों से होता है बहुमत से नहीं , जैसे - एक सूर्य तमनाशक है , अनंततारे नहीं।

शंका :- प्रमाण किसे कहते हैं ?

समाधान - किसी पदार्थ का सत्यस्वरूप जिस साधन से जाना जाए या निश्चय किया जाए वह 'प्रमाण' है।

शंका :- तर्क किसे कहते हैं ?
समा . किसी कारण को देखकर किसी विषय में विचार करना , कि यह वस्तु ऐसी होनी चाहिए यह ' तर्क है।

शंका :- मूर्ति किसे कहते हैं ?

समाधान- जिसमें रूप - रंग व आकार हो , उसे ' मूर्ति ' कहते हैं।

शंका :- क्या मनुष्य भी मूर्ति है ?

समाधान , हाँ , मनुष्य भी चेतन मूर्ति है।

शंका :- मूर्ति कितने प्रकार की होती है ?

समाधान , दो - जड़ मूर्ति व चेतन मूर्ति।

शंका :- जड़ मूर्तियां कौन सी हैं ?

समा . पृथ्वी , सूर्य , पहाड़ , कार , मोबाईल आदि।

शंका :- चेतन मूर्तियां कौन सी हैं ?

समा . माता-पिता , शिक्षक , अतिथि आदि देवता।

शंका :- जड़ मूर्तिपूजा कैसे करते हैं ?

समा . ईश्वर रचित पृथ्वी , जल , सूर्यादि और मनुष्य रचित घर , कार , मोबाइलादि जड पदार्थों का रख - रखाव व उनका बुद्धिपूर्वक उपयोग लेकर सुखी होना ' जड़ मूर्तिपूजा ' है।

शंका :- चेतन मूर्तिपूजा की विधि क्या है ?

समाधान- माता - पिता , आचार्य , विद्वानादि पालनकर्ता लोगों से विद्या - सुशिक्षा लेना । उनकी आज्ञा का पालन करना । उनके प्रति निंदा , हिंसा , कटुवचन न बोलना । तन , मन व धन से उनकी सेवा , रक्षा करना 'चेतन मूर्तिपूजा' कहलाती है।

शंका :- ईश्वर की मूर्ति नहीं होती , क्या वेदों में इसका प्रमाण है ?

समा . हाँ , ' न तस्य प्रतिमाऽस्ति ' यजुर्वेद ३२.३ अर्थात् ' ईश्वर की प्रतिमा - मूर्ति नहीं होती । '

शंका :- लोग सर्वव्यापक , निराकार , ईश्वर की मूर्तिपूजा क्यों करते हैं ?

समा . अपनी अज्ञानता , अविद्या , हठ - दुराग्रह , स्वार्थ , भय और गलत सीखने - सिखाने से ।

शंका :- क्या श्रीराम ने रामेश्वरम् में महादेव की मूर्ति स्थापित कर पूजा नहीं की थी ?

समाधान - नहीं की । देखो - 'अत्र पूर्व महादेवः प्रसादमकरोत् विभुः' अर्थात् _ _ _ हे सीते ! यह वह स्थान है जहां पर विभु अर्थात् सर्वव्यापक महादेव ईश्वर ने हम पर कृपा की थी । अत : 'विभु' होने से महादेव की मर्ति पूजा स्वयं असिद्धि हो गई ।

ये वाल्मीकि रामायण युद्ध कांड में आया हैं वहां किसी तरह की लिंग स्थापना और पूजा का वर्णन नहीं है

श्रीराम सीता जी से कहने लगे पुष्पक विमान में बैठे हुए बोले हे वैदेही यह वही जगह है जहां बैठकर हम देवों के देव महादेव अर्थात परमपिता परमात्मा की उपासना किया करते थे

शंका :- क्या सच्ची प्रार्थना व समर्पण से ईश्वर हमारे पाप क्षमा कर देता है ?

समाधान - नहीं , सच्ची प्रार्थना से दयालु प्रभु हमें पाप से बचने व दु:ख सहने की महानशक्ति देता है।

शंका :- ईश्वर दयालु है तो हमारे पाप क्षमा क्यों नहीं करता ?

समाधान - इसलिए कि -
१ . क्षमा करने से सुधार कभी नहीं होता ।
२ . वह दयालु है, हमें पापों से बचाना चाहता है। ३ . ईश्वर न्यायकारी है , जैसा कर्म वैसा फल ।
४ . कर्मफल न देने से ईश्वर अन्यायकारी होता है

शंका :- क्या कोई धर्मगुरु आदि हमारे पाप कर्मों को अपने उपर ले सकता हैं ?

समा , नहीं ले सकता । अपने किए कर्मों का फल करोड़ जन्म लेकर भी स्वयं ही भोगना पड़ता है।

शंका :- कुछ महापुरुष दुष्टों के पाप कर्मों को क्षमा कर देते हैं , क्या ये सत्य है ?

समा . नहीं , अपितु महापुरुष दुष्टों के अन्याय को सह लेते हैं , द्वेष नहीं करते , यही क्षमा का अर्थ है।

शंका :- जी , क्या तीर्थ , मन्दिर , पीर - दरगाह और सैयद जाने से पाप नहीं छूटते ?

समा . नहीं , पापों का नाश तो ईश्वर भक्ति , योगाभ्यास , सत्यभाषण और परोपकारादि से होता है।

शंका :- प्रायश्चित किसे कहते हैं ?

समा . किए गए पाप कर्मों के प्रति घृणा - ग्लानि व कुछ कष्ट भोगने के भाव को ' प्रायश्चित ' कहते हैं।

शंका :- प्रार्थना से पाप क्षमा हो जाते हैं , इस भ्रम का क्या कारण है ?

समाधान- कुछ स्वार्थी पंडे - पुजारी , कथावाचक , झूठे धर्मगुरु , ज्योतिषी व अज्ञान - अविद्या ।

शंका :- सब शंकाओं का समाधान व विद्याओं का मूल कारण क्या है ?

समा . ' ईश्वर ' व उसकी दी गई ' वेद विद्या ' ।

शंका :- पूजाघरों में रखी मूर्तियां ईश्वर की नहीं है तो फिर किसकी हैं ?

समा . कुछ तो पूर्वज महापुरुषों की हैं और कुछ काल्पनिक निराधार हैं।

शंका :- क्या धार्मिक , सत्यवादी , देशभक्तों , महापुरुषों के चित्र या मूर्ति घर में रख सकते हैं ? समाधान- हॉ , अवश्य रखें । उनके जीवन से शिक्षा ग्रहण करें और अपने जीवन को भी महान बनाए लेकिन अप्रामाणिक , विज्ञान विरुद्ध चित्र न रखें। प्रामाणिक चित्र रखें व उनकी सुरक्षा भी करें।

शंका :- परमेश्वर की भक्ति न करने से क्या हानि हो सकती है ?
समा . ईश्वर भक्तिहीन कभी भी पाप कर्मों से छुटकर सुख - शांति प्राप्त नहीं कर सकता ।

शंका :- संसार में परमपूज्य और धारण करने योग्य देवता कौन है ?

समा . 'परमपिता परमेश्वर' ।

शंका :- मनुष्य के जीवन का मुख्य उद्देश्य क्या है ?

समाधान- 'परमेश्वर की प्राप्ति, मोक्ष की प्राप्ति'।

हमारा दोष ये हैं की हमारी सुई राम चरित मानस भागवत आदि १८ पुराणों पर रुकी हुई हैं हम उससे ऊपर चले तो सत्य की सच्ची जानकारी प्राप्त करे जैसे वाल्मीकि रामायण महाभारत शास्त्र उपनिषद मनु स्मृति वेद आदि वैदिक साहित्य को पढ़े ( टीवी वाली रामायण महाभारत देखने से सत्य असत्य का ज्ञान कभी नही होगा ये धर्म ग्रंथ के हिस्से भी नही हैं ) तभी सत्य असत्य का पता लगेगा

पिछले २५०० वर्षों में आर्यावर्त २४ बार विभाजित हो चुका हैं कारण वही सत्य अर्थात धर्म की रक्षा न होने के कारण ।

आज का वेद मंत्र

ओ३म् शं नो धाता शमु धर्त्ता नो अस्तु शं न उरूची भवतु स्वधाभि:। शं रोदसी बृहती शं नो अद्रि: शं नो देवानां सुहवानि सन्तु ।( ऋग्वेद ७|३५|३)

अर्थ:- सबका पोषण तथा धारण करने हारा परमात्मा हमारे लिए शान्तिदायक हो, पृथ्वी अमृतमय अन्नादि पदार्थों के साथ शान्ति देने वाली हो, विस्तृत अन्तरिक्ष एवं भूमि हमारे लिए शान्तिकारक हो, मेघ व पर्वत हमें शान्ति देने वाले हो और देवों- विद्वानों के सुन्दर स्तुति ज्ञान हमारे लिए शान्तिदायक हो

आओ वेदों की ओर लौटें
जो वेदों की निन्दा करता हैं नही मानता हैं वही नास्तिक हैं

सत्य असत्य के निर्णय हेतु सत्यार्थ प्रकाश पढ़े पढ़ाए

अपने सत्य इतिहास और संस्कृति को जानने के लिए youtube चैनल ज्ञान मंजूषा जेठालाल को सर्च करे subscribe करे अति कृपा होगी

आर्यसमाज जय आर्यावर्त

सत्य सनातन वैदिक धर्म

प्रस्तुत कर्ता जेठालाल विश्वकर्मा आर्य अलीपुर दिल्ली ९८११८६१९३२

शंका :-  पूजा किसे कहते हैं ?समाधान. किसी वस्तु का सम्मान कर , उससे यथायोग्य लाभ लेना ' पूजा ' है । शंका  :-  ईश्वर पूजा...
11/01/2023

शंका :- पूजा किसे कहते हैं ?

समाधान. किसी वस्तु का सम्मान कर , उससे यथायोग्य लाभ लेना ' पूजा ' है ।

शंका :- ईश्वर पूजा किसे कहते हैं ?

समा . ईश्वर के उपदेशों का पालन कर ज्ञान व आनन्द लेना । ' ईश्वर की पूजा ' या ' ईश्वरभक्ति ' करना कहलाती है ।

शंका :- ईश्वरभक्ति की क्या विधि है ?

समा . ईश्वर के तुल्य अपने गुण - कर्म - स्वभाव को बनाना ।

शंका :- इश्वरभक्ति के क्या लाभ हैं ?

समा , आत्मबल की प्राप्ति , पूर्ण सुख - शांति व ईश्वर की प्राप्ति ।

शंका :- क्या ईश्वर की मूर्ति पर फल - फूल चढ़ाकर पूजा नहीं कर सकते ?

समाधान - नहीं, मूर्ति जड़ है । ईश्वर चेतन व निराकार है उस पर फल - फल , जलादि नहीं चढ़ सकते ।

शंका :- ईश्वर की मूर्ति जड़ नहीं होती , पुजारी उसमें प्राणप्रतिष्ठा कर देते हैं , तब क्या दोष है ?

समाधान - ये प्राणप्रतिष्ठा नहीं , पाखंडप्रतिष्ठा है क्योंकि प्राणप्रतिष्ठा के बाद भी मूर्ति जीवित - चेतन नहीं होती ।

शंका :- जो बच्चों के समान ईश्वर का सही स्वरूप नहीं जानते क्या उनके लिए मूर्तिपूजा ठीक नहीं हैं ?

समाधान - नहीं , बच्चों को शुरु में २×८ = १६ सिखाते हैं या २×८ = ८ ? , २×८ =१६ ही ना । तब गणित के समान विद्या - विज्ञान के दाता ईश्वर के स्वरूप को ही ठीक न सीखना व सिखाना महापाप , महाअन्याय है।

शंका :- क्या मूर्तिपूजा ईश्वरप्राप्ति का साधन नहीं है , जैसे - सेवकों के माध्यम से प्रधानमंत्री से मिलते हैं ?

समा - नहीं , क्योंकि सेवक चेतन , ज्ञानी है वह प्रधानमंत्री से मिला सकता है , लेकिन मूर्ति तो ज्ञानहीन जड़ है , वह न बोल सकती है न चल सकती है इसलिए ईश्वर से नहीं मिला सकती।

शंका :- जी , ये तो श्रद्धा का विषय है ' जैसी भावना वैसा भगवान का रूप ' , ठीक है ना ?

समा. नहीं , ये अश्रद्धा है। श्रद्धा का अर्थ है 'सत्य को स्वीकार करना' जिसका आधार है तर्क व प्रमाण।

शंका :- ईश्वर तो एक व निराकार ही है उसके रूप अनेक हैं , तब मूर्तिपूजा में क्या दोष है ?

समा. दोष ये है कि ' निराकार वस्तु के अनेक रूप ' का उदाहरण संसार में कोई नहीं दिखा सकता ।

शंका क्या कलियुग में मूर्तिपूजा ही ईश्वर की पूजा नहीं है ?

समा . नहीं , क्योंकि कलियुग में सूर्य को सूर्य ही मानते हैं अत : कलियुग में ईश्वर को मूर्ति मानना अविद्या है।

शंका :- ऐसी कौन सी वस्तु है जिसमें ईश्वर नहीं है ?

समा . कोई नहीं , ईश्वर कण - कण में है।

शंका :- कण - कण में है तो मूर्ति में ईश्वर क्यों नहीं है ?

समा. सर्वव्यापक होने से मूर्ति में भी है। मूर्ति में ईश्वर हैं परंतु मूर्ति ईश्वर नही है

शंका :- जब मूर्ति में भी ईश्वर है तो मूर्तिपूजा का खंडन क्यों ?

समा. क्योंकि जड़ मूर्ति में ईश्वर के समान ज्ञान , बल व सर्वज्ञता आदि गुण नहीं हैं। मूर्तियां सब काल्पनिक हैं मूतियों चित्रों का सम्मान करना चाहिए और महापुरुषों के सच्चे चरित्र को धारण करना कराना ही श्रेष्ठ कर हैं।

शंका :- मूर्तिपूजा तो लोग ईश्वर के अवतारों की करते हैं , इसलिए कोई दोष नहीं है।

समा . दोष है , अवतार कहते हैं ' उतरने को ' । सर्वव्यापक होने से ईश्वर का आना - जाना असंभव है।

शंका :- ईश्वर अवतार न ले तो पापियों का नाश कैसे करेगा ?

समा . जैसे - बिना जन्म लिए ईश्वर पापियों के शरीर बना देता है , वैसे ही नष्ट भी कर सकता है।

शंका :- क्या ईश्वर चौथे , सातवें आसमान या बैकंठधाम में नहीं बैठा है ?

समाधान- नहीं , अनन्त ईश्वर का तिलभर के संसार या स्थान विशेष में रहना संभव नहीं है।

शंका :- ईश्वर भक्तों के दुःख दूर कैसे करता है ?

समा . अपने भक्तों को ज्ञान , बल व सामर्थ्य देकर।

शंका :- जन्म लेने से ईश्वर में क्या दोष आते हैं ?

समा . जन्म लेने से ईश्वर : - सर्वज्ञ से अल्पज्ञ , सर्वत्र से एकत्र , स्वतंत्र से परतंत्र , निराकार से साकार , निर्विकार से विकारी और पवित्र से अपवित्र हो जाएगा।

शंका :- मूर्ति से ईश्वर की याद व ध्यान होता है , इसलिए मूर्तिपूजा में दोष नहीं है ?

समाधान- ये सत्य नहीं। इतने विशाल ब्रह्मांड , सूर्य , चंद्रमा , पहाड व शरीर की रचना को देखकर जिसका ईश्वर की याद अथवा ध्यान नहीं होता , उसका मानवकृत मूर्ति में भी ईश्वर का ध्यान नहीं लगेगा ।

शंका :- निराकार ईश्वर का दर्शन या साक्षात्कार किसे कहते हैं ?

समा . ईश्वर के ज्ञान , बल व आनन्दादि की अनुभूति होने को ही ' दर्शन ' या ' साक्षात्कार ' कहते हैं।

शंका :- ईश्वर का साक्षात्कार कौन कर सकता है ?

समा . ईश्वर का उपासक , वेदों का विद्वान , धर्मात्मा - मुमुक्षु , योगी संन्यासी।

शंका :- सच्चे आस्तिक की क्या पहचान होती है ?

समा-
१. सच्चा आस्तिक सदैव निर्भय , प्रसन्न रहता है। २. भौतिक सुखों में आकर्षित नहीं होता ।
३. सब प्राणियों से आत्मवत् व्यवहार करता है।
४. वेदानुसार निष्काम कर्म करता है।

शंका :- सभी मत - सम्प्रदाय ईश्वर के प्रतीक पूजते हैं , क्या बहुमत से मूर्तिपूजा सत्य सिद्ध नहीं होती ?

समाधान- सत्य का निर्णय तर्क व प्रमाणों से होता है बहुमत से नहीं , जैसे - एक सूर्य तमनाशक है , अनंततारे नहीं।

शंका :- प्रमाण किसे कहते हैं ?

समाधान - किसी पदार्थ का सत्यस्वरूप जिस साधन से जाना जाए या निश्चय किया जाए वह 'प्रमाण' है।

शंका :- तर्क किसे कहते हैं ?
समा . किसी कारण को देखकर किसी विषय में विचार करना , कि यह वस्तु ऐसी होनी चाहिए यह ' तर्क है।

शंका :- मूर्ति किसे कहते हैं ?

समाधान- जिसमें रूप - रंग व आकार हो , उसे ' मूर्ति ' कहते हैं।

शंका :- क्या मनुष्य भी मूर्ति है ?

समाधान , हाँ , मनुष्य भी चेतन मूर्ति है।

शंका :- मूर्ति कितने प्रकार की होती है ?

समाधान , दो - जड़ मूर्ति व चेतन मूर्ति।

शंका :- जड़ मूर्तियां कौन सी हैं ?

समा . पृथ्वी , सूर्य , पहाड़ , कार , मोबाईल आदि।

शंका :- चेतन मूर्तियां कौन सी हैं ?

समा . माता-पिता , शिक्षक , अतिथि आदि देवता।

शंका :- जड़ मूर्तिपूजा कैसे करते हैं ?

समा . ईश्वर रचित पृथ्वी , जल , सूर्यादि और मनुष्य रचित घर , कार , मोबाइलादि जड पदार्थों का रख - रखाव व उनका बुद्धिपूर्वक उपयोग लेकर सुखी होना ' जड़ मूर्तिपूजा ' है।

शंका :- चेतन मूर्तिपूजा की विधि क्या है ?

समाधान- माता - पिता , आचार्य , विद्वानादि पालनकर्ता लोगों से विद्या - सुशिक्षा लेना । उनकी आज्ञा का पालन करना । उनके प्रति निंदा , हिंसा , कटुवचन न बोलना । तन , मन व धन से उनकी सेवा , रक्षा करना 'चेतन मूर्तिपूजा' कहलाती है।

शंका :- ईश्वर की मूर्ति नहीं होती , क्या वेदों में इसका प्रमाण है ?

समा . हाँ , ' न तस्य प्रतिमाऽस्ति ' यजुर्वेद ३२.३ अर्थात् ' ईश्वर की प्रतिमा - मूर्ति नहीं होती । '

शंका :- लोग सर्वव्यापक , निराकार , ईश्वर की मूर्तिपूजा क्यों करते हैं ?

समा . अपनी अज्ञानता , अविद्या , हठ - दुराग्रह , स्वार्थ , भय और गलत सीखने - सिखाने से ।

शंका :- क्या श्रीराम ने रामेश्वरम् में महादेव की मूर्ति स्थापित कर पूजा नहीं की थी ?

समाधान - नहीं की । देखो - 'अत्र पूर्व महादेवः प्रसादमकरोत् विभुः' अर्थात् _ _ _ हे सीते ! यह वह स्थान है जहां पर विभु अर्थात् सर्वव्यापक महादेव ईश्वर ने हम पर कृपा की थी । अत : 'विभु' होने से महादेव की मर्ति पूजा स्वयं असिद्धि हो गई ।

ये वाल्मीकि रामायण युद्ध कांड में आया हैं वहां किसी तरह की लिंग स्थापना और पूजा का वर्णन नहीं है

श्रीराम सीता जी से कहने लगे पुष्पक विमान में बैठे हुए बोले हे वैदेही यह वही जगह है जहां बैठकर हम देवों के देव महादेव अर्थात परमपिता परमात्मा की उपासना किया करते थे

शंका :- क्या सच्ची प्रार्थना व समर्पण से ईश्वर हमारे पाप क्षमा कर देता है ?

समाधान - नहीं , सच्ची प्रार्थना से दयालु प्रभु हमें पाप से बचने व दु:ख सहने की महानशक्ति देता है।

शंका :- ईश्वर दयालु है तो हमारे पाप क्षमा क्यों नहीं करता ?

समाधान - इसलिए कि -
१ . क्षमा करने से सुधार कभी नहीं होता ।
२ . वह दयालु है, हमें पापों से बचाना चाहता है। ३ . ईश्वर न्यायकारी है , जैसा कर्म वैसा फल ।
४ . कर्मफल न देने से ईश्वर अन्यायकारी होता है

शंका :- क्या कोई धर्मगुरु आदि हमारे पाप कर्मों को अपने उपर ले सकता हैं ?

समा , नहीं ले सकता । अपने किए कर्मों का फल करोड़ जन्म लेकर भी स्वयं ही भोगना पड़ता है।

शंका :- कुछ महापुरुष दुष्टों के पाप कर्मों को क्षमा कर देते हैं , क्या ये सत्य है ?

समा . नहीं , अपितु महापुरुष दुष्टों के अन्याय को सह लेते हैं , द्वेष नहीं करते , यही क्षमा का अर्थ है।

शंका :- जी , क्या तीर्थ , मन्दिर , पीर - दरगाह और सैयद जाने से पाप नहीं छूटते ?

समा . नहीं , पापों का नाश तो ईश्वर भक्ति , योगाभ्यास , सत्यभाषण और परोपकारादि से होता है।

शंका :- प्रायश्चित किसे कहते हैं ?

समा . किए गए पाप कर्मों के प्रति घृणा - ग्लानि व कुछ कष्ट भोगने के भाव को ' प्रायश्चित ' कहते हैं।

शंका :- प्रार्थना से पाप क्षमा हो जाते हैं , इस भ्रम का क्या कारण है ?

समाधान- कुछ स्वार्थी पंडे - पुजारी , कथावाचक , झूठे धर्मगुरु , ज्योतिषी व अज्ञान - अविद्या ।

शंका :- सब शंकाओं का समाधान व विद्याओं का मूल कारण क्या है ?

समा . ' ईश्वर ' व उसकी दी गई ' वेद विद्या ' ।

शंका :- पूजाघरों में रखी मूर्तियां ईश्वर की नहीं है तो फिर किसकी हैं ?

समा . कुछ तो पूर्वज महापुरुषों की हैं और कुछ काल्पनिक निराधार हैं।

शंका :- क्या धार्मिक , सत्यवादी , देशभक्तों , महापुरुषों के चित्र या मूर्ति घर में रख सकते हैं ? समाधान- हॉ , अवश्य रखें । उनके जीवन से शिक्षा ग्रहण करें और अपने जीवन को भी महान बनाए लेकिन अप्रामाणिक , विज्ञान विरुद्ध चित्र न रखें। प्रामाणिक चित्र रखें व उनकी सुरक्षा भी करें।

शंका :- परमेश्वर की भक्ति न करने से क्या हानि हो सकती है ?
समा . ईश्वर भक्तिहीन कभी भी पाप कर्मों से छुटकर सुख - शांति प्राप्त नहीं कर सकता ।

शंका :- संसार में परमपूज्य और धारण करने योग्य देवता कौन है ?

समा . 'परमपिता परमेश्वर' ।

शंका :- मनुष्य के जीवन का मुख्य उद्देश्य क्या है ?

समाधान- 'परमेश्वर की प्राप्ति, मोक्ष की प्राप्ति'।

हमारा दोष ये हैं की हमारी सुई राम चरित मानस भागवत आदि १८ पुराणों पर रुकी हुई हैं हम उससे ऊपर चले तो सत्य की सच्ची जानकारी प्राप्त करे जैसे वाल्मीकि रामायण महाभारत शास्त्र उपनिषद मनु स्मृति वेद आदि वैदिक साहित्य को पढ़े ( टीवी वाली रामायण महाभारत देखने से सत्य असत्य का ज्ञान कभी नही होगा ये धर्म ग्रंथ के हिस्से भी नही हैं ) तभी सत्य असत्य का पता लगेगा

पिछले २५०० वर्षों में आर्यावर्त २४ बार विभाजित हो चुका हैं कारण वही सत्य अर्थात धर्म की रक्षा न होने के कारण ।

आज का वेद मंत्र

ओ३म् शं नो धाता शमु धर्त्ता नो अस्तु शं न उरूची भवतु स्वधाभि:। शं रोदसी बृहती शं नो अद्रि: शं नो देवानां सुहवानि सन्तु ।( ऋग्वेद ७|३५|३)

अर्थ:- सबका पोषण तथा धारण करने हारा परमात्मा हमारे लिए शान्तिदायक हो, पृथ्वी अमृतमय अन्नादि पदार्थों के साथ शान्ति देने वाली हो, विस्तृत अन्तरिक्ष एवं भूमि हमारे लिए शान्तिकारक हो, मेघ व पर्वत हमें शान्ति देने वाले हो और देवों- विद्वानों के सुन्दर स्तुति ज्ञान हमारे लिए शान्तिदायक हो

आओ वेदों की ओर लौटें
जो वेदों की निन्दा करता हैं नही मानता हैं वही नास्तिक हैं

सत्य असत्य के निर्णय हेतु सत्यार्थ प्रकाश पढ़े पढ़ाए

अपने सत्य इतिहास और संस्कृति को जानने के लिए youtube चैनल ज्ञान मंजूषा जेठालाल को सर्च करे subscribe करे अति कृपा होगी

आर्यसमाज जय आर्यावर्त

सत्य सनातन वैदिक धर्म

प्रस्तुत कर्ता जेठालाल विश्वकर्मा आर्य अलीपुर दिल्ली ९८११८६१९३२

10/01/2023

ॐ श्री विश्वकर्मा विश्व पांचाल ब्राह्मण धर्म वर्णन ॐ
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🚩स्कंद पुराने नागर खंडे 13 अध्याये ईश्वर षष्ट मुख संवाद ईश्वर उवाच।। 🚩

ॐ मनुर्मयश्च त्वष्टा: च शिल्पी च विश्वज्ञ एव च।
पंचैते देव ऋषयो विश्वकर्ममुखोद्भवा:।।
ॐ सृष्टि प्रवर्तकाह्येते रथकारास्तु पंच च।
शतं च विंशति: पंच वंशजा विश्वकर्मणाम्।।

🚩अर्थात मनु मय त्वष्टा शिल्पी और विश्वज्ञ (दैवज्ञ)ये पांचों देव ऋषि श्री विश्वकर्मा के मुख्य से उत्पन्न हुए हैं इनका मुख्य कर्तव्य सृष्टि उत्पन्न करने का है तथा सृष्टि के निमित्त रथ मूर्ति इत्यादि भी बनाने का है इन पांचों ऋषियों से आगे 2500 ऋषि पांचाल ब्राह्मण उत्पन्न हुए तथा इसी प्रकार इनसे और सृष्टि श्री विश्वकर्मा मुख उत्पन्न पांचाल ब्राह्मणों की उत्पन्न हुई है इन्हें विश्व ब्राह्मण कहते हैं।

ॐ तद्वंशसंभवा: सर्वे पंच पंचास्यसंभवा: ।
जायंतेअनुयुगं लोके सृष्टिसंत्राणतत्परा: ।।
ॐ कृते तु मनसासृष्टस्त्रेतायां दृष्टि साधनम्।।

🚩 श्री विश्वकर्मा मुखोउत्पन्न पांचाल ब्राह्मणों की जितनी वंशावली है वह सब इन्हीं पांचों देवता और देव ऋषि सानग, सनातन ,अहसान, और सुपर्ण से उत्पन्न हुई है यह पांचाल ब्राह्मण हमेशा सृष्टि कर्म में तत्पर रहते हैं सतयुग में मनसे त्रेता में दृष्टि साधन से (देखने) से द्वापर में मंत्र से कलयुग में केवल हाथ से (कारीगरी )से सृष्टि कर्म उत्पन्न होती है इस प्रकार पांचाल ब्राह्मण हमेशा शिल्प कर्म करते चले आ रहे हैं और युगानुसार सृष्टि कर्म में तत्पर हैं।

ॐ वैदिकेन मार्गेण तद्वंश्यानां विशेषत: ।।
गर्भाधानं निषेकं तु तुर्ये पुंसवनक्रिया।।
ॐ मासेअष्में हि सीमंतो जातेवै जातकर्म च।
अहन्येकादशे नाम षष्टे मास्यन्नभोजनम्।।

🚩 वेदादि शास्त्रों में पांचाल ब्राह्मणों का धर्म-कर्म इत्यादि का खुलासा वर्णन इस तरह किया हुआ है,

ॐ षोडश संसकार 👉
(१) वीर से गर्भ स्थित होता है ,
(२) पश्चात पुंसवन होतहोता हैं ,
(३) आठवें महीने में गांठि बंधन(सीमांत) करना चाहिए,
(४) उत्पन्न होने पर नंदी मुख श्राद्ध सीमन्तोन्नयन करना चाहिए ,
(५) ग्यारहवें दिन पर नामकरण करना चाहिए ,
(६) छठे महीने अन्नप्राशन करना चाहिए।

ॐ वर्षे तृतीये चौल स्यादष्टमे चोपनायनम्।
वेदव्रतचतुष्कंतु गोदानं षोडशे तथा।।
ॐ वत्सरे स्नातकं कर्म वैवाहं पैत्रमेधिकम्।
इति षोडश कर्माणि वंश्यानां विश्वकर्मण: ।।

अर्थात 👉 (७) तीसरे वर्ष क्षौर कर्म (मुंडन) कराना चाहिए,
(८) आठवें वर्ष उपनयन यज्ञोपवीत (जनेऊ कराना )चाहिए ,
(९) वेदव्रत (वेदा अध्ययन वेद आदि पढ़ना)
(१०) वेदव्रत (वेदाअध्ययन वेद विद्या का पढ़ाना)
(११) वेदव्रत (वेद पाठन पूजा पाठ इत्यादि वैदोक्त रीति से करना)
(१२) वेदव्रत (वेद कर्म वेद आदि में लिखने के मुताबिक धर्म-कर्म अर्थात यज्ञ आदि करना)
(१३) सोलह वर्ष के उपरांत गोदान कर्म
(१४) पश्चात स्नातक कर्म करें
(१५) उपरांत इन कर्मों के बाद विवाह होना चाहिए
(१६) और विवाह के बाद पितर कर्म करना चाहिए

अर्थात 👉 यही षोडश कर्म श्री विश्वकर्मा मुखोउत्पन्न पांचाल ब्राह्मणों को करना आवश्यक है । बिना इन षोडश कर्मो के किये जो कोई केवल पशु की तरह अपना जन्म व्यतीत करता है वह स्वधर्म त्याग के दोष से अंत समय तक दरिद्र रहता है पश्चात 60000 वर्ष तक घोर नरक वास करता है ।
जब तक यज्ञोपवीत ना हो उनके हाथ का जल पीना निषेध है क्योंकि बिना मौजी धारण के काया शुद्ध नहीं होती है

ॐ नमो विश्वकर्मणे 🙏🙏🙏🙏🙏

🚩 अखंड विश्वकर्मा ब्राह्मण महासभा कार्यक्षेत्र संपूर्ण भारतवर्ष( लोह, काष्ठ, ताम्र, शिल्प और स्वर्ण) 🚩
(पंडित रामदरश शास्त्री रीवा मध्यप्रदेश)

05/01/2023

🙏ॐ नमो विश्वब्रह्मणे🙏
।। मनुष्य का गुरु विश्वकर्मा ।।
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न तं विदाथ य ईमा जजानान्यद्युष्माकर्मतरं वभुव ।
यजु. अ.१७ मं.३१
ईदानी विश्वकर्मा मनुष्याणां उपदेशं ददाती । न तं विदाय न तं विदाथ न जानिय, तं परं पुरुषं । य इमानी भुत् जातानी जजान जानयती उपसहरती च । अत: कारणात् युष्माकञ्च तस्य च पुरुषस्य अन्यत् महत् अन्तरं वभुव पुरुषो जनको युयं जन्या: ।।
उवट भाष्य ।।
अर्थ:- ईश समय विश्वकर्मा मनुष्यों को उपदेश देता है कि तुम उस परम पुरुष को नहि जानते हो जो कि ईन पाँच भुतों को उत्पन्न करता और संहार करता है । ईश कारण से तुममें और उस परम् पुरुष में अत्यन्त भेद है क्यों कि वह पुरुष जनक ( पिता ) है और तुम ( जन्य ) पुत्र हो ।
यो विश्वकर्मा ईमा ईमानि भुत जातानी जजान उत्पादितवान विश्वकर्माणम् हे जिवा: युयं न विदाय न जानिथ ।।
यजु. अ. १७ मं.३१ ।। महिधर भाष्य ।।
अर्थ- जो विश्वकर्मा ईन पाँचौं भुतों का उत्पन्न करनेवाला है उस विश्वकर्मा को हे जिवो ! तुम नहि जानते ।।
।। चतुर्मुख विश्वकर्मा ।।
विश्वकर्मा ह्यजानिष्ट देव आदिद् गन्धर्वो अभवद् द्वितीय: ।
ब्रह्माण्ड मध्य गतानामुत्तपत्ती रुच्यते ब्रह्माण्ड मध्ये प्रथमं विश्वकर्मा देव त्रीयगादी जगदभेद कर्त्ता सत्य लोक वासी चतुर्मुखों देव अजनिष्ठ आदित्यान्तर पुरुष रुपेण जात: ।
अर्थ:- अब ब्रह्माण्ड के मध्यस्थों कि उत्पत्ती कहि जाती है । ब्रह्माण्ड के मध्य में सबसे प्रथम देव तथा त्रीभगादी जगत का भेद कर्त्ता सत्यलोक में रहने वाला चतुर्मुख ( चारमुख वाला ) विश्वकर्मा देव आदित्य में पुरुष रुप से उत्पन्न हुआ ।
यजु. अ. १७ मं.३२ महिधर भाष्य ।।
।। संसार कि रचना करनेवाला विश्वकर्मा ।।
" विश्वकर्मा विस्मुवञ्चतु "
यजु. अ.१२ मं.६१ ।।
विश्वकर्मा विश्वं सृष्टि रुपं कर्म यस्या स विश्वकर्मा ।
महिधर भाष्य ।।
अर्थ:- सृष्टि कि रचना करना है कर्म जिसका उसको विश्वकर्मा कहते है ।
विश्वकर्मा त्वादित्यैरुत्तरत: पातु: ।
यजु. अ. ५ मं.११ ।
विश्वकर्मा विश्वानी कर्माणी जगदुत्पत्यादिनी यस्य स विश्वकर्मा आदित्यैर्द्वादश संख्यैर्गण देवै: सहित उत्तरत उत्तरस्यां द्रीशिपात् ।। महिधर भाष्य ।।
अर्थ:- जगत कि उत्पत्ती आदि है कर्म जिसके वह विश्वकर्मा वारह (१२) मास आदित्यगण देवों के सहित उत्तर दिशा में तेरि रक्षा करें ।
" विश्वकर्मणे स्वहा" । यजु. अ.१२ मं.४३ ।।
अर्थ:- जगत कि उत्पती और पालनादी कर्म करनेवाले तुझ विश्वकर्मा के लिये सत्य वचन हो ।
" येन प्रजा विश्वकर्मा जजान " । यजु. १३,१५ ।।
विश्वकर्मा स एव प्रजापती: येनाजेन वाग् रुपेण प्रजा जजान उत्पादित्वान् ।।
अर्थ:- वहि विश्वकर्मा प्रजापती है जिसने कि वाणी रुप अज के द्वारा प्रजा को उत्पन्न किया है । महिधर भाष्य ।।
।। प्रजापत्ती विश्वकर्मा ।।
वाग् वा अजो वाचो वै प्रजा: विश्वकर्मा जजानेती ।
शतपथ.कां.७ प्र.५/२/२१ ।।
अर्थ:- वाणी हि अज है , वाणी के द्वारा हि प्रजापती विश्वकर्मा ने प्रजा को उत्पन्न किया है ।
" प्रजापतिर्वै विश्वकर्मा" शतपथ ७/४/२/५ ।।
" प्रजापतिर्वै विश्वकर्मा" शतपथ ८/२/१/१० ।।
" प्रजापतिर्वै विश्वकर्मा" शतपथ ८/२/३/१३ ।।
अर्थ स्पष्ट है ।।
" विश्वकर्मा ऋषि: " यजु. अ. १३ मं. ५८ महिधर भाष्य ।।
विश्वकर्मा विश्व करितिती विश्वकर्मा ऋषि: ।
अर्थ:- विश्वकर्मा सम्पुर्ण जगत् रचता है ईसिलिए विश्वकर्मा ऋषि है ।
" विश्वकर्मा त्वा सादयतु " यजु. १४/१४ महिधर भाष्य ।।
हे ईष्टके ! ज्योतिष्मती वायु रुपं त्वां विश्वकर्मा अन्तरिक्षस्य पृष्ठे त्वां सादयतु ।
अर्थ:- हे ईष्ट ! ज्योती वाली वायु रुप तुझको विश्वकर्मा अन्तरिक्ष के पृष्ठभाग में स्थापित करें । म.भा. ।।
" मन्त्र दृष्टा विश्वकर्मा ।। ऋग्वेद मं.१० सु.८१ ऋषि १-७ ।।
विश्वकर्मा भौवन: । विश्वकर्मा देवता ।
ऋग्वेद मं.१० सु.८२ ऋषि १-७ ।।
विश्वकर्मा भौवन: । विश्वकर्मा देवता ।
" यइमा विश्वा " यजु. अ. १७ मं. १७ ।।
भुवन पुत्र विश्वकर्मा दृष्टा विश्वकर्म देवत्या: षोडश त्रीष्टुभ: ।।
ॐ नमो विश्वकर्मणे🙏🌹🕉️

🚩🚩 *विश्वकर्मा प्रकट दिवस के पूर्व महत्वपूर्ण संदेश*🚩🚩 (नोट - विश्वकर्मा समाज की संस्थाएं समाज में जागरूकता हेतु इस संदे...
05/01/2023

🚩🚩 *विश्वकर्मा प्रकट दिवस के पूर्व महत्वपूर्ण संदेश*🚩🚩 (नोट - विश्वकर्मा समाज की संस्थाएं समाज में जागरूकता हेतु इस संदेश को अपने कार्यक्रम के निमंत्रण पत्र में छपवा सकते हैं या अन्य मार्गों से प्रचार कर सकते हैं।)

🚩 *विश्वकर्मा शब्द का अर्थ एवं वेद शास्त्रों में प्रमाण*🚩
*यो विश्वं सर्वकर्म क्रियामाणस्य स विश्वकर्मा:* अर्थात जो एकमात्र ब्रह्म परमात्मा समस्त संसार की उत्पत्ति से लेकर प्रलय के साथ समस्त कर्म करने की योग्यता रखता है उस परमपिता परमेश्वर को ' *विश्वकर्मा* ' कहा जाता है।
सर्वप्रथम , विश्वकर्मा की उपाधि परब्रह्म परमपुरुष को प्राप्त हुई जिसकी उद्घोषणा समस्त वेद-शास्त्र करते हैं। इसी उपाधि से उनका वैदिक प्रचलित नाम *विश्वकर्मा* भी हुआ। इन्हीं ब्रह्म अर्थात परब्रह्म को सृष्टि की सबसे शाश्वत ध्वनि अर्थात नाद को *ॐ* भी कहा गया। उन्ही को शास्त्रों में *विष्णु* (सर्वव्यापक) , *शिव* (कल्याण), *पशुपति* , *विराट*, *प्रजापति*(प्रजा पालक) , *हिरण्यगर्भ* आदि ये सब नाम एवम् उपाधियाँ उसी *विश्वकर्मा* ब्रह्म अर्थात परब्रह्म परमात्मा की है। परब्रह्म विश्वकर्मा को ही सर्वदृष्टा, सर्वपालक, सर्वश्रेष्ठ औऱ सर्वस्तुत्य पिता कहा है। वे परमात्मा ही विश्वपति, विश्वरूप, नियामक, पालक, सभी यज्ञों के भोक्ता , स्वामी तथा धाता-विधाता कहे गए हैं। यथा प्रमाण ;
*विश्वकर्मा विमना आद्विहाया धाता विधाता परमोत संदृक् ।*
*तेषामिष्टानि समिषा मदन्ति यत्रा सप्तऋषीन्पर एकमाहुः ॥* - (ऋग्वेद मंडल - १०, सूक्त - ८२, मंत्र - २)
अर्थात - वो महान विश्वकर्मा जिसका समस्त जग को निर्माण करने का कार्य है और जो अनेक प्रकार के विज्ञान से युक्त ,समस्त पदार्थों में व्याप्त ,सबका धारण पोषण करनेवाला एवं रचने वाला, सबको एक समान देखने वाला , सबसे उत्तम जो है और जो परमात्मा अद्वितीय है वैसा कोई और नहीं है। विद्वान लोग कहते हैं वो सप्तऋषियों से भी ऊंचे स्थान पर स्थापित है और उनकी अभिलाषाओ को हव्यान्न द्वारा पूर्ण करते हैं।
विश्वकर्मा परमात्मा ही विष्णु , कृष्ण ,वैकुंठ, विश्वात्मा , पुरुषोत्तम भगवान हैं। यथा प्रमाण ;
*विश्वकर्मनमस्तेस्तु विश्वात्मा विश्वसंभव।*
*विष्णो विष्णो हरे कृष्ण वैकुंठ पुरुषोत्तम ॥*
-(महाभारत शांतिपर्व युधिष्ठिर उवाच अध्याय-४३ श्लोक - ५)
अर्थात - तुम ही विष्णु, विष्णु हो, तुम ही हरे कृष्ण हो, वैकुंठ हो , तुम ही पुरुषोत्तम हो, तुम ही विश्वात्मा हो और जगत को उत्पन्न करने वाले हों । इससे हे विश्वकर्मा आपको नमस्कार है।

🚩 *विश्वकर्मा प्रकट दिवस क्यों मनाया जाता है ?*🚩
वेद-शास्त्रों में देवताओं के आचार्य एवं शिल्पी के रूप में देवाचार्य देवशिल्पी भगवान विश्वकर्मा को माना जाता है। माघ मास के शुक्ल पक्ष के तेरहवें दिन अर्थात माघ शुक्ल त्रयोदशी के दिन देवाचार्य भगवान विश्वकर्मा प्रकट हुये थे। जिस कारण इस दिन विश्वकर्मा प्रकट दिवस के रूप में यज्ञ, हवन ,पूजन के साथ हर्षोल्लास से मनाया जाता है। कुछ विद्वानों की मान्यता ये भी हैं कि इसी दिन राजा पृथू को भगवान विश्वकर्मा ने स्वप्न में आकर दर्शन दिये थे जिस कारण उनका प्रकट दिवस या उत्सव के रूप में मनाया जाता है। भगवान विश्वकर्मा जी की माता का नाम भुवना हैं जिस कारण इन्हें *भौवन विश्वकर्मा* भी कहा जाता हैं।

🚩 *देवाचार्य देवशिल्पी भगवान विश्वकर्मा के कुल का शास्त्रीय प्रमाण एवं उनका दिव्य स्वरूप* 🚩
*बृहस्पतेस्तु भगिनी वरस्त्री ब्रह्मचारिणी ।*
*योगसिद्धा जगत्कृत्स्नमसक्ता विचरत्युत ।*
*प्रभासस्य तु सा भार्या वसूनामष्टमस्य तु ॥*
*विश्वकर्मा महाभागस्तस्यां जज्ञे प्रजापतिः।*
*कर्ता शिल्पसहस्राणां त्रिदशानां च वार्धकिः॥*
- (विष्णुपुराण/प्रथमांश:/अध्याय -१५, श्लोक - ११८-११९)
अर्थात - देवगुरु बृहस्पति की बहन वरस्त्री(भुवना), जो ब्रह्मचारिणी थी और सिद्ध योगिनी थी तथा अनासक्त भाव से समस्त भूमंडल में विचरती थी, वो आठवें वसु प्रभास की धर्मपत्नी हुई। उन्हीं के पुत्र रूप में सहस्त्रों शिल्पों के कर्ता , देवताओं के शिल्पी एवं आचार्य महाभाग अर्थात महाभाग्यशाली प्रजापति देवाचार्य देवशिल्पी विश्वकर्मा प्रकट हुए।
*देवाचार्य देवशिल्पी भगवान विश्वकर्मा जी का दिव्य स्वरूप लक्ष्मीनारायण संहिता में वर्णित हैं यथा प्रमाण ;
*विश्वकर्मा चतुर्बाहुरक्षमालां च सूत्रकम् ।*
*गजं कमण्डलुं धत्ते त्रिनेत्रो हंसवाहनः ।।*
- (लक्ष्मीनारायणसंहिता/खण्ड-२/अध्याय-१४२,श्लोक- १०)
अर्थात - चार भुजाओं वाले देवाचार्य देवशिल्पी भगवान विश्वकर्मा जी ने रक्षमाला और एक धागा (जनेऊ या सूत का धागा) धारण किया है। उनके पास एक हाथी और एक जलपात्र है, उनकी तीन आंखें हैं और उनके पास एक हंस वाहन स्वरूप भी है।

🚩 *भगवान विश्वकर्मा को शास्त्रों में देवाचार्य , श्रेष्ठ देवता और श्रेष्ठ ब्राह्मण होने का प्रमाण* 🚩
*देवाचार्यस्य महतो विश्वकर्मस्य धीमतः।*
*विश्वकर्मात्मजश्चैव विश्वकर्ममयः स्मृतः॥*
- (वायुपुराण/उत्तरार्धम्/अध्याय - २२, श्लोक - २०)
अर्थात - महान और बुद्धिमान विश्वकर्मा देवताओं के आचार्य (गुरु) हुए हैं और उनके पुत्र भी उन्हीं के समान गुणों वाले हुए।
*तस्मिन्नेव ततः काले शिल्पाचार्यो महामतिः।*
*विश्वकर्मा सुरश्रेष्ठः कृष्णस्य प्रमुखे स्थितः॥*
(हरिवंशपुराण/पर्व २ (विष्णुपर्व)/अध्यायः ०५८,श्लोक -२२)
अर्थात - उसी क्षण देवताओं में श्रेष्ठ महान बुद्धिजीवी देवताओं के शिल्प के आचार्य विश्वकर्मा जी भगवान कृष्ण के सामने प्रकट हुए।
*शातनं तेजसो मेऽद्य क्रियतामिति भास्करः।*
*तञ्चाह विश्वकर्माणं संज्ञायाः पितरं द्विज॥*
- (मार्कण्डेयपुराण/अध्याय - ७७/श्लोक - ४१)
अर्थात - संज्ञा के पिता विश्वकर्मा जी से सूर्य ने कहा - हे ब्राह्मण , आप मेरा तेज घटा दीजिये।

🚩 *हमारी जाति , हमारा वेद , हमारे कुल, इष्टदेवता एवं आराध्य देवता कौन हैं ?*🚩
१) हमारी जाति - 'विश्वकर्मा वैदिक ब्राह्मण' और
हमारी उपजाति - पाँच पंचशिल्पी वर्ग में कोई एक।
२) कुल, इष्टदेवता एवं आराध्य देवता - भगवान विश्वकर्मा जी। (जिन लोगों के कुल परंपरा से कुलदेवता और कुलदेवी ज्ञात हैं वो लोग उन्हें भी मानें, जिनके नहीं ज्ञात हैं वो भगवान विश्वकर्मा जी को मान सकते हैं।)
३) हमारा वेद - अथर्ववेद (कार्मिक दृष्टि से संपूर्ण समाज का) और कुल परंपरागत दृष्टि से अपने अपने अलग वेद , उपवेद , शाखा , सूत्र , प्रवर, शिखा आदि हो सकते हैं। अथर्ववेद का उपवेद शिल्पवेद हैं जिस कारण कार्मिक दृष्टिकोण से समस्त भारतवर्ष में हम *अथर्ववेदीय विश्वकर्मा वैदिक ब्राह्मण* सिद्द होते हैं।
४) हमारा मुख्य उपनाम (समस्त भारतवर्ष) - आचार्य (आचारी ,चारी) , शर्मा , धीमान , पांचाल , जांगीड़, मैथिल , ओझा , झा , विश्वकर्मा , विश्वब्राह्मण ,मालवीय , वेदपाठक , महामुनि , धर्माधिकारी , दीक्षित , पंडित , महाराणा , राणा आदि २०० से ज्यादा हैं।

🚩 *शिल्पकर्म और वास्तुकला एक ब्राह्मण कर्म कैसे है उसका शास्त्रीय प्रमाण*🚩
*शिल्पकर्म* की उत्पत्ति वेदांग कल्प के शुल्ब-सूत्र से हुई है और वास्तुकला की उत्पत्ति वेदांग ज्योतिष की संहिता स्कंध से हुई है। वेदांग ग्रंथों का अध्ययन करना ब्राह्मणो का प्रमुख कर्तव्य आदिकाल से रहा है। शुल्ब-सूत्र से यज्ञवेदी (यज्ञकुंड), यज्ञशाला, यज्ञमंडप, यज्ञपात्र, मूर्ति आदि का निर्माण होता हैं। ब्राह्मणों के दो प्रमुख कर्म हैं एक है इष्टकर्म (षटकर्म आदि) और दूसरा है पूर्तकर्म (शिल्पादि कर्म आदि)।
*आचारहीनान्न पुनंति वेदा यद्यप्यधीताः सह षद्भिरङ्गैः।*
*शिल्पं हि वेदाध्ययनं द्विजानां वृत्तं स्मृतं ब्राह्मणलक्षणं तु।* -(भविष्यपुराण ब्राह्मपर्व-१, अध्याय - ४१,श्लोक - ७)
अर्थात - वेदों का अध्ययन छ: अंगों द्वारा होते हुए भी सदाचार से रहित व्यक्ति को शुद्ध नहीं करता। शिल्पकर्म के लिये वेदों का अध्ययन द्विज रूपी ब्राह्मणों के कर्म एवं लक्षण हैं।
*इष्टकाश्च यथान्यायं कारिताश्च प्रमाणतः।*
*चितोऽग्निर्ब्राह्मणैस्तत्र कुशलैः शुल्बकर्मणि॥*
- (वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड सर्ग - १४,श्लोक -२८)
अर्थात - यज्ञ हेतु अग्निकुंड में ईंटें नियम और मानकों के अनुसार बनाई गई थीं। शुल्ब-सूत्र से उत्पन्न शिल्पकर्म मे निपुण ब्राह्मणों ने इन ईंटो से अग्निकुंड बनाकर अग्नि स्थापित की गईं।
विश्वकर्मा वैदिक ब्राह्मण जो शिल्प करते हैं वो सामान्य शिल्प नहीं हैं अपितु , उसे ब्रह्मशिल्प कर्म कहा जाता हैं जिस कारण ये 'ब्रह्मशिल्पी ब्राह्मण' भी कहलाते हैं। ब्रह्मशिल्प कर्मो का निर्वहन आज भी विश्वकर्मा शिल्पी ब्राह्मण पाँच प्रकार के शिल्पकर्मो के माध्यम से करते आ रहें है। पंचशिल्पकर्म एवं पंचशिल्पी ब्राह्मण निम्न है , लौह शिल्प - लौहकार ब्राह्मण (लोहार), काष्ठ शिल्प - काष्ठकार ब्राह्मण (बढ़ई) , ताम्र शिल्प - ताम्रकार ब्राह्मण, शिला शिल्प - शिल्पी ब्राह्मण (मूर्तिकार) , स्वर्ण शिल्प - स्वर्णकार ब्राह्मण (सोनार) हैं । इसमें मेढ़ क्षत्रिय (सोनार)एवं हैहेय वंशी क्षत्रिय(ताम्रकार) एवं अन्य उपजातियाँ तथा अन्य वनवासी उपजातियाँ सम्मिलित नहीं है जिन्होंने अपनी जीविका के लिए मात्र शिल्पकर्म को अपनाया। इनका विश्वकर्मा कुल के ब्राह्मण वंश परंपरा से कोई संबंध नहीं है। प्रजापति कुम्हारों का हमारी जाति कुलपरंपरा से कोई संबंध नहीं हैं।
🚩 *हमारे ब्राह्मण होने का प्रसिद्ध ब्राह्मण विद्वानों की पुस्तकों में प्रमाण* 🚩
१)' ब्राह्मणोत्पत्तीमार्तण्ड ' ग्रंथ उसमें पृष्ठ ५६२ - ५६८ तक विश्वकर्मा पांचाल ब्राह्मणों का उल्लेख ' अथ पांचालब्राह्मणोंत्पत्ती प्रकरण ' बताकर दिया गया है।
२) ' ब्राह्मणोंत्पत्ति दर्पण ' नामक पुस्तक में पृष्ठ क्रमांक ३५८ से ३६१ तक विश्वकर्मा पांचाल ब्राह्मणों की उत्पत्ति बताई गई है और उन्हें ब्राह्मण स्वीकार किया गया हैं।
३) काशी से प्रकाशित 'आदित्य पंचांग' के विश्वकर्मा वैदिक ब्राह्मणों को अथर्ववेदीय ब्राह्मण बताकर जांगिड़ ब्राह्मण एवं पांचाल ब्राह्मण से संबोधित किया गया है। इसके पुराने संस्करण के पृष्ठ ४६ और नवीन संस्करण (२०२२-२३)के पृष्ठ ४४ पर प्रमाण देखा जा सकता हैं।
🚩ॐ नमो विश्वकर्मणे🚩
- पं.संतोष आचार्य
अखंड विश्वकर्मा ब्राह्मण महासभा® (संपूर्ण भारत)
(नोट - विश्वकर्मा समाज की संस्थाएं समाज में जागरूकता हेतु इस संदेश को अपने कार्यक्रम के निमंत्रण पत्र में छपवा सकते हैं या अन्य मार्गों से प्रचार कर सकते हैं।)

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