12/01/2016
खान खनिज और अधिकार
संपादकीय / अक्तूबर-नवंबर २०१५
दुनिया की चकाचौंध व हलचल झारखंड जैसे इलाको की जोर पर बना हुआ है. क्योंकि दुनिया की चकाचौंध व हलचल को बनाये रखने के लिए इन्ही क्षेत्र के प्राकृतिक संसाधन और श्रम का उपयोग होता है. इस पर कब्ज़ा बनाये रखने के लिए कारपोरेट घरानों में होड़ मची रहती है. इसी होड़ के कारण दुनिया में युद्धों का सृजन होता है और झारखंड जैसे इलाको में शोषण की प्रक्रिया जारी रहती है. इस शोषण प्रक्रिया को जन स्वीकृति प्रदान कराने हेतु तरह –तरह की अनुकूलन का अभियान चलाया जा रहा है.
झारखंड जैसे इलाको में अनुकूलन के अभियान के कारण आज संक्रमण के दौर से गुजर रहा है, जिसमें क्षेत्रीय दलों से लेकर बहुसंख्य एनजीओ तक सभी अपने चरित्र में बदलाव ला रहे हैं. यह बदलाव न तो आधार आदिवासी केन्द्रित है और न ही यहाँ के इतिहास और संस्कृति के अनुकूल. इनके बदलाव का आधार है- पूंजीवादी व्यवस्था में अनुकूलन. इसके अलावा यहाँ रहने वाले समुदायों की सांस्कृतिक–सामाजिक संरचना को तहस–नहस कर दी जा रही है. आज एक ऐसा आदिवासी समाज समेत सभी दलित-उत्पीडित समुदाय हमारे बीच अस्तित्व में आ रहा है, जो अपनी संस्कृति से विहीन अपने आप को इसी शोषणयुक्त व्यवस्था में सामने की कोशिश में जुटा है और बदहाल व बदतर जीवन- स्तर जीने के लिए विवश हैं, जिसमें वे अब तक नहीं रहे थे.
इनके पास पहले से मौजूद जीवन जीने की बुनियादी सुविधा जैसे हवा, पानी, और जमीन सब पर कारपोरेट घरानों का कब्ज़ा बढता जा रहा है. ये बुनियादी सुविधा कारपोरेट घरानों के लिए मुनाफा कमाने की वस्तु में बदल दी गयी है. इस बदलाव की प्रक्रिया में दलित-उत्पीडित समुदायों द्वारा सदियों से संजोये गये ऐतिहासिक और दुखद अनुभवों से उन्हें अलग कर दिया जा रहा है. जबकि सच्चाई यह है कि बगैर मेहनत के मुनाफा का सृजन नहीं हो सकता. यह आज भी उतना ही सच है कि बगैर मेहनत के मुनाफा का सृजन नहीं हो सकता. यह आज भी उतना ही सच है. लेकिन इस सच को झुठलाने के लिए तरह–तरह की साजिशे वर्तमान सत्ता द्वारा हो रही है और मेहनत जिसके जीवन का आधार है, उसकी सुविधाओं और अधिकारों में बराबर कटौती होती जा रही है. सबसे दुःख की बात है की इस साजिशों को तार-तार करने की जवाबदेही, जिन राजनैतिक जमातों ने अपना प्राथमिक बना रखा था, वे काफी कमजोर और प्रभावहीन हो चुके हैं. परन्तु इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि इनके पास संसद से लेकर सड़क तक संघर्ष का गौरवशाली अनुभव और विरासत है. लेकिन इनकी राजनैतिक शुचिता के अहं ने इनके आधार को और भी सीमित कर दिया है. परिणामत: इनके नेतृत्व के प्रति विश्वसनीयता में निरंतर ह्रास होता जा रहा है. जबकि उनकी जरूरत आज पहले की अपेक्षा काफी बढ़ चुकी है. इसे हम इस तरह से समझ सकते हैं कि आज अमीरी-गरीबी की खाई पहले की अपेक्षा अधिक भयावह है, पिछले २५० सालों के गौरवशाली संघर्ष से प्राप्त अधिकारों और सुविधाओं से मजदूर और अन्य कामगारों को को अलग कर दिया जा रहा है, कारपोरेट घरानों का हमारे जीवन के हर पहलू पर निरंतर कब्जा बढ़ता जा रहा है. ऐसे में इन जमातों का कर्त्तव्य था कि वर्तमान समय की साजिशों को जनता के समक्ष उजागर किया जाता. वे तो अपने अस्तित्व को बचाने में भी सक्षम नहीं नहीं हो पा रहे हैं. परंतु वे वर्तमान समय की सच्चाई को स्वीकार कर विकल्प तलाशने के बजाय बराबर उसी ढांचे में मजबूत बनने की कोशिश कर रहे हैं, जो उन्हें और भी कमजोर कर दे रहा है.
वर्तमान समय की विकृतियों को लेकर कई एनजीओ और जनसंगठन अपना काम कर रहे है चाहे वह जमीन पर वर्तमान समय की विकृतियों को लेकर जमीन पर कारपोरेट घरानों के कब्जे को लेकर हो या फिर औधोगिक विकृतियों और श्रम कानूनों में हो रहें संशोधन में हो रहे संशोधन के खिलाफ. परंतु राजनैतिक चेतना और संघर्ष के विरासत की स्पष्ट समझ के अभाव में वे तात्कालिक कारणों तक सीमित रह जा रहें हैं और समस्या की मूल जड़ निरंतर मजबूत होती जा रही है. कुछ लोगों का तो यह भी भ्रम है कि राजनैतिक कार्यों में आये खालीपन को हम अपने सामाजिक कार्यों से भर देंगे और दुखित और दमित जनता की मुक्ति के सपने को साकार कर देंगे. लेकिन अब तक के अनुभव यह साबित करते हैं कि राजनैतिक साजिशों का जवाब राजनैतिक कार्रवाई ही दे सकती है. अगर हम इस खालीपन को सामाजिक आन्दोलन के माध्यम से भरने की कोशिश करेंगे, तो वह कहीं न कहीं पूंजीवादी राजनीति और अर्थशास्त्र को मजबूत करेगा. वही वर्तमान सत्ता द्वारा इन एनजीओ के काम करने के अवसर को कम कर दे रहा है. ऐसे में हमें सोचना पड़ेगा कि हम बहुत ही संकट के दौर में जी रहें हैं, जहाँ शोषित- पीड़ित समुदाय को अलग-अलग खाचों में बाँटने की परिस्थितियां राजसत्ता खड़ी है. यहाँ तक संविधान द्वारा बनाये गये राज्य व केंद्र के शक्तियों और अधिकारों के साथ भी छेड़-छाड़ जारी है. सामाजिक और सांस्कृतिक तानेबाने को छिन्न-भिन्न कर ऐसा इंसान सृजित किया जा रहा है, जो उन्माद और क्रूरता से भरा हो. इसके कई उदहारण हमें देखने को मिल रहा है.
दोनों को अपनी-अपनी सीमा और कमजोरी को समझना होगा. इसके बाद ही कोई रास्ता निकल सकता है. आज ज्यादा जरुरी है कि दोनों जमात अपने –अपने दायित्व का निर्वाह करे. क्योंकि दोनों के अस्तित्व को वर्तमान राजसत्ता नष्ट करने पर लगी है. हमले काफी भयावह है. अगर अपने-अपने अहम् के कारण दोनों सचेत नहीं हुए, तो इतिहास इन्हें माफ़ नहीं करेगा. आज जरुरी है कि सामाजिक आन्दोलन और राजनैतिक आंदोलन साथ-साथ परस्पर सहयोग और निर्भरता से एक ऐसी दुनिया का सपना गढ़े, जो क्रूरता और उन्माद का अंत कर विवेकशील इंसान को रहने लायक हो.