खान खनिज और अधिकार

खान खनिज और अधिकार खान, खनिज और अधिकार : एक परिचय

खान खनिज और अधिकार एक मासिक बुलेटिन है, जो भारत, खासकर झारखंड, ओडिशा और छत्तीसगढ़ के खनन प्रभावित समुदायों के स्वरों का प्रतिनिधित्व करती है. साथ ही इसके माध्यम से हम खनन प्रभावित समुदायों को खनन उद्योग में स्थानीय लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तरों पर हो रहे बदलावों के बारे में उन तक सूचना पहुँचाने का प्रयास करते हैं, ताकि उनकी सामाजिक और राजनैतिक चेतना विकसित हो और अपने हितों के अनुकूल परिस्थिति का निर्मा

ण करते हुए एक ऐसे समाज का निर्माण कर सके, जिसमें शोषणमूलक इतिहास का अंत हो सके और एक स्थायी और स्वतस्फूर्त विकास के लिए सामाजिक और राजनैतिक माहौल का विकल्प जिंदा रह सके. यह एक ऐतिहासिक और सृजनात्मक कार्य है, जिसमें विकल्प की सम्भावनाओं के प्रति आस्थावान लोगों से हमें सहयोग की अपेक्षा है, ताकि हम अपनी धरती अपने पूरे सौन्दर्य के साथ अगली पीढ़ी को सौंप सके.
संपादक, खान, खनिज और अधिकार

कोयला मंत्री पीयूष गोयल ने १०वे वेतन बातचीत में टांग अड़ाई और बातचीत पर पानी फेर दिया।कोल इंडिया लिमिटेड (CIL) की यूनियन ...
02/09/2017

कोयला मंत्री पीयूष गोयल ने १०वे वेतन बातचीत में टांग अड़ाई और बातचीत पर पानी फेर दिया।

कोल इंडिया लिमिटेड (CIL) की यूनियन के साथ चल रही बातचीत का नतीजा २५ अगस्त को हो गया था और ३१ तरीख को दोने के बीच करार पर हस्ताक्षर होने थे। CIL १२℅ कह रही थी, यूनियन ५०℅ वेतन में बढ़ोतरी मांग रहे थे।
कुल बातचीत के ८ दौर के बाद दोनों २०℅ पर राज़ी हुए थे।
तभी देर रात भाजप के मंत्री पीयूष गोयल ने तीन अतिरिक्त मुद्दों का समावेश किया।

१) अगर किसी कर्मचारी की दुर्घटना में मौत होती है या वो पूरी तरह अपाहिज होते है तो अबसे उसके घर के किसी अन्य सदस्य को नौकरी नही दी जाएगी।

२) अब से खनन का काम हफ्ते के सभी ७ दिन करना होगा और रविवार को काम करने पर अन्य किसी दिन छुट्टी मिलेगी। लेकिन उस छुट्टी का पगार नही दिया जाएगा।

३) ठेका मज़दूरों के मामले को लेकर CIL यूनियन के साथ कोई बातचीत नही करेगी जैसे अब तक चलते आ रहा था।

स्वाभाविक है के यह सभी मुद्दों पर बात बिगड़ गई और करार नही हो सका।

अब सितंबर १८/१९ को फिर बातचीत होगी।

इन बातचीत में भाजपा और वांगपंथी पार्टी के यूनियन हिस्सा ले रहे है और कोर्ट के आदेशानुसार कांग्रेस की इंटुक को इनमे हिस्सा लेने पर पाबंदी है।

आखरी मौकेपर पीयूष गोयल का इस तरह पलट जाना दर्शाता है के सरकार CIL का या तो निजीकरण चाहती है या तो मशीनों द्वारा अधिक काम करके मज़दूर हटाना चाहती है।

Trade union leaders blamed the coal ministry for the delay

कोल इंडिया लि. (CIL) ने वेतन बढ़ोतरी की बातचीत में अपना रुख कड़ा कर लिया है।यूनियन और सी आय एल के बीच अब तक वार्ता के ८ दौ...
25/08/2017

कोल इंडिया लि. (CIL) ने वेतन बढ़ोतरी की बातचीत में अपना रुख कड़ा कर लिया है।
यूनियन और सी आय एल के बीच अब तक वार्ता के ८ दौर हुए है पर CIL अपने रवैये पर खड़ा है की मौजूदा हालात को देखते वो वेतन नही बढ़ा सकती।
CIL का कहना है की बाजार में कोयला अतिरिक्त मात्रा में उपलब्ध है और वो दाम नही बढ़ा सकती। वही उसको पावर प्लांट को कम दाम में बेचना पड़ रहा है।
कंपनी का कहना ये भो है कि नई खदान खोलने पर उसे ३०,००० विस्थापित लोगो को नौकरियां देनी पड़ती है। सरकार की नई कोयला प्रणाली के चलते बाजार में नई कंपनिया आ रही है जिससे मुनाफा और घटेगा।

इससे पहले का करार २०१६ तक लागू था। अब जो करार होगा इससे मज़दूरों को जुलाई २०१६ से लेकर अब तक का अतिरिक्त वेतन भी मिलना है।

यूनियन ने ५0% बढ़ोतरी की मांग से शुरुवात की थी, लेकिन अब बात २१% पर आ गयी है।

CIL वो भी देने से इनकार कर रही है।

KOLKATA (miningweekly.com) – Coal India Limited (CIL) has hardened its stance in negotiating a coal wage agreement, with the miner this week citing an adverse business environment as a limitation to effecting a wage hike for its estimated 370 000 workers.

दुनिया की सबसे बड़ी कोयला कंपनी कोल् इंडिया लिमिटेड (CIL) नही चाहती कि मुनाफा कम हो।चाहे इसलिए मज़दूरों का शोषण क्यों न हो...
20/08/2017

दुनिया की सबसे बड़ी कोयला कंपनी कोल् इंडिया लिमिटेड (CIL) नही चाहती कि मुनाफा कम हो।
चाहे इसलिए मज़दूरों का शोषण क्यों न हो।

यूनियन की मांग थी कि २५℅ वेतन में बढ़ोतरी हो लेकिन CIL१५℅ से ज्यादा देने से इनकार कर रही है। यूनियन से बातचीत असफल रही है और अगली बातचीत दिल्ली में २४ अगस्त को होगी।

वैसे भी CIL ३० से अधिक खदान बंद करने की बात कर रही है क्योंकि उनसे मुनाफा नही हो रहा, वही नई तकनीक एवं मशीन द्वारा खनन पर जोर दे रही है।
इसमे बेचारे मज़दूर की हालत दिन ब दिन खस्ता होती है रही हैं।

Representatives of four trade unions - CITU, AITUC, BMS and HMS -- and the Coal India chairman and other board members failed to reach concensus on wage hike.

झारखंड सरकार झरिया की भूमिगत आग से बचाने के लिए एक नई टाउनशिप का निर्माण करेगी एवं नाइ रेल पटरिया बिछाने के लिए रेलवे को...
08/07/2017

झारखंड सरकार झरिया की भूमिगत आग से बचाने के लिए एक नई टाउनशिप का निर्माण करेगी एवं नाइ रेल पटरिया बिछाने के लिए रेलवे को ज़मीन मोहय्या करेगी।
सवाल यह है कि क्या सभी को इससे लाभ मिलेगा और इस अतिरिक्त जमीन अधिग्रहण का किन लोगों पर असर पड़ेगा।
BCCL की इन कोयले की खदानों में १०० साल से भूमिगत आग जल रही है, कुछ समय पहले भारतीय रेल ने झरिया से गुजरने वाली ट्रेन सेवाएं बंद करने का निर्णय लिया क्यों कि दुर्घटना की संभावना बहुत अधिक हो गायी है, झरीया की काई पिढीया सास की बिमारी के शिकार होकार बे मौत मारे गाये है और इस बात को काई आंतरराष्ट्रीय मीडिया में काई सालो से दिखाया गया है।
देर आये दुरुस्त आये याही केहकार आशा करते है की अब राहत के कार्य मे विलंब या घोटले ना हो।

Chief Minister Raghubar Das has assured all his support for the new township in Dhanbad and said that land will be provided as soon as possible for the laying down new line in the area. Das was

15/06/2017

क्या आप जानते है?

कोल इंडिया लिमिटेड (CIL) १९७५ में स्तापित कि गयी जब देश की सारी कोयले की खदानों का राष्ट्रीयकरण किया गया।

CIL मे तभी ६,५0,000 स्थायी (permanant) मज़दूर थे, जिनकी संख्या घट कर २०१४ में ३,३३,000 हो गई और अब अनुमान है के ये ३,२५,००० से कम है।

मज़दूर यूनियन के मुताबिक सन २०१४-१५ में ५२% कोयला खनन ठेके मज़दूरों (contract labour) ने किआ जो इस साल बढ़कर ५५% हो जाएगा।

इन ठेके मज़दूरों का वेतन कम होता है, तथा उन्हें मूलभूत सेवाएं नही मिलती। कई साल काम करने के बावजूद उन्हें नौकरी से हटाया जाता है।

झारखंड के राजमहल खदान की दुर्घटना में १८ मज़दूरों की मौत हुई थी। मज़दूर यूनियन का दावा है कि इसके लिए ठेका प्रणाली जिम्मेवार है क्योंकि ठेकेदार बिना किसी सुरक्षा प्रशिक्षण मज़दूरों को खतरे के काम करवाते है। सरकार की खान सुरक्षा विभाग ने भी इस बात को माना है।

कोल इंडिया ली (CIL) ने कहा है की ३४ भूमिगत कदन इस साल बंद करेगी जिससे ८०० से १००० करोड़ रुपयो की बचत कंपनी को होगी।इन खदा...
10/06/2017

कोल इंडिया ली (CIL) ने कहा है की ३४ भूमिगत कदन इस साल बंद करेगी जिससे ८०० से १००० करोड़ रुपयो की बचत कंपनी को होगी।

इन खदानों के बंद होने से लगबग १५,००० मज़दूरों को अन्य नौकरियां देने का प्रस्ताव है ताकी उनकी रोज़ी रोटी पर कोई असर ना हो।

यह प्रस्ताव २०१७-१८ साल के लिए है क्योंकि कोयले की बिक्री कम हो गयी है।
CIL की इन् कंपनियों से प्रभाव पड़ेगा -

Eastern Coalfields (ECL), Bharat Coking Coal (BCCL), South Eastern Coalfields (SECL) and Central Coalfields (CCL)

Coal India has identified some 60 underground mines belonging to its four subsidiaries, for closure in phases.

पिछले १०१ साल से झरिया में भूमिगत आग दहक रही है। कोयले के इन खानो में यह आग बेकाबू है।भारतीय रेल ने अब यहाँ की रेल लाइन ...
31/05/2017

पिछले १०१ साल से झरिया में भूमिगत आग दहक रही है। कोयले के इन खानो में यह आग बेकाबू है।
भारतीय रेल ने अब यहाँ की रेल लाइन हटाने का फैसला लिया है और अगले दो साल में पर्यायी नई लाइन तैयार होगी।
झरिया में लगने वाली आग से ज़मीन ढसने की वजह से रेल की पटरिया खिसक जाती है जिससे दुर्घटना होने की संभावना होती है।
इस मार्ग पर से भारत की सबसे ज्यादा चलने वाली ट्रेने है जो कि हावड़ा-नई दिल्ली मार्ग है। इसके अलावा, धनबाद-रांची एवं दरबंगा मार्ग के भी ट्रेनों का समावेश है।
करीब ₹३००० करोड़ का खर्चा रेल, केंद्र एव्म झारखंड राज्य सरकार को उठाना पड़ेगा। इतना पैसा न होने के कारण, रेल मंत्रालय झरिया खानो से कर वसूल करने की सोच रहा है।

चलो, १०० साल बाद ही सही, कुछ तो अकल आयी।

This is seen as the first serious effort by the Centre to solve the 100-year-old problem by dousing the flames and restoring the land.

देहरादून (उत्तराखंड): अवैद्य रूप से चलने वाली खानो की खिलाफ भूक हड़ताल पर है स्वामी शिवानंदगंगा नदी के किनारों पर खनिज खन...
26/05/2017

देहरादून (उत्तराखंड): अवैद्य रूप से चलने वाली खानो की खिलाफ भूक हड़ताल पर है स्वामी शिवानंद
गंगा नदी के किनारों पर खनिज खनन सर्वोच्च न्यायालय ने पहले ही रोक के आदेश दिये हैं, परंतु यहा बड़ी मात्रा में फिर भी यह चल रहा है।

२०११ में संत निगमानंद ने इसी मुद्दे को लेकर इसी जगह पर ६८ दिन उपोषण करने पर अपने जान का बलिदान दिया था।

सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बावजूद, राज्य सरकार ने खनन चलाने की अनुमति दी है।

Swami Shivanand, head of Matri Sadan Ashram, on Wednesday went on indefinite fast against mining in the stretch from Raiwala to Bhogpur in the Ganga riverbed at Haridwar, while his disciple Swami Atmabodhanand, who was on a fast since May 14, ended it

झारखंड : रांची से २६० किमी जतपुर में ४ लोगो की गोलीबारी में मौत हुई । अवैध रूप से रेत .(बालू) निकाल रहे ठेकेदार एवं गांव...
23/05/2017

झारखंड : रांची से २६० किमी जतपुर में ४ लोगो की गोलीबारी में मौत हुई । अवैध रूप से रेत .(बालू) निकाल रहे ठेकेदार एवं गांववालो के बीच झड़प हुई तब गोली बरी करके ठेकेदार ने ३ गांववालो को मार दिया वही गुस्से में एक बालू कर्मचारी की भी मौत हुई

झारखंड में २०१५ से इस उद्योग पर कड़े कानून लागू है। फिर भी पुलिस तथा अन्य कर्मचारियों को घूस देकर बड़ी मात्रा में बालू निकलती है।
इससे पर्यावरण पर बहुत बुरा असर होता है।

Four killed in eastern India as villagers protest sand mining - By Jatindra Dash BHUBANESWAR, India, May 22 (Thomson Reuters Foundation) - F our people were killed and two injured when dozens of villagers in eastern India clashed with workers mining sand, police said on Monday, in the latest such in...

We want coal, we want iron & steel, we want aluminium, we want cement, we want sand, we want shiny diamonds, we want ura...
03/01/2017

We want coal, we want iron & steel, we want aluminium, we want cement, we want sand, we want shiny diamonds, we want uranium, we want silicon, we want rare earths.....The list is long.
But we dont want to and/or want to care about the pathetic safety records and working conditions of the mine workers.
Put your hand on your hearts and think whether you take the same interest in reading about a mining disaster as you take in reading about a socialites death?
The answer is known and hence these poor miners (often contract labour) work in extremely unsafe mines deep underground so that others can enjoy the fruits of "development"
Development which never reaches them.
Only poor wages, poor health and omnipresent death reach them in the deep bowels of the earth.

Eastern Coalfields, where the latest accident has taken place, is a subsidiary of State-owned Coal India Ltd (CIL), the world’s largest coal miner.

12/01/2016

खान खनिज और अधिकार
संपादकीय / अक्तूबर-नवंबर २०१५
दुनिया की चकाचौंध व हलचल झारखंड जैसे इलाको की जोर पर बना हुआ है. क्योंकि दुनिया की चकाचौंध व हलचल को बनाये रखने के लिए इन्ही क्षेत्र के प्राकृतिक संसाधन और श्रम का उपयोग होता है. इस पर कब्ज़ा बनाये रखने के लिए कारपोरेट घरानों में होड़ मची रहती है. इसी होड़ के कारण दुनिया में युद्धों का सृजन होता है और झारखंड जैसे इलाको में शोषण की प्रक्रिया जारी रहती है. इस शोषण प्रक्रिया को जन स्वीकृति प्रदान कराने हेतु तरह –तरह की अनुकूलन का अभियान चलाया जा रहा है.
झारखंड जैसे इलाको में अनुकूलन के अभियान के कारण आज संक्रमण के दौर से गुजर रहा है, जिसमें क्षेत्रीय दलों से लेकर बहुसंख्य एनजीओ तक सभी अपने चरित्र में बदलाव ला रहे हैं. यह बदलाव न तो आधार आदिवासी केन्द्रित है और न ही यहाँ के इतिहास और संस्कृति के अनुकूल. इनके बदलाव का आधार है- पूंजीवादी व्यवस्था में अनुकूलन. इसके अलावा यहाँ रहने वाले समुदायों की सांस्कृतिक–सामाजिक संरचना को तहस–नहस कर दी जा रही है. आज एक ऐसा आदिवासी समाज समेत सभी दलित-उत्पीडित समुदाय हमारे बीच अस्तित्व में आ रहा है, जो अपनी संस्कृति से विहीन अपने आप को इसी शोषणयुक्त व्यवस्था में सामने की कोशिश में जुटा है और बदहाल व बदतर जीवन- स्तर जीने के लिए विवश हैं, जिसमें वे अब तक नहीं रहे थे.
इनके पास पहले से मौजूद जीवन जीने की बुनियादी सुविधा जैसे हवा, पानी, और जमीन सब पर कारपोरेट घरानों का कब्ज़ा बढता जा रहा है. ये बुनियादी सुविधा कारपोरेट घरानों के लिए मुनाफा कमाने की वस्तु में बदल दी गयी है. इस बदलाव की प्रक्रिया में दलित-उत्पीडित समुदायों द्वारा सदियों से संजोये गये ऐतिहासिक और दुखद अनुभवों से उन्हें अलग कर दिया जा रहा है. जबकि सच्चाई यह है कि बगैर मेहनत के मुनाफा का सृजन नहीं हो सकता. यह आज भी उतना ही सच है कि बगैर मेहनत के मुनाफा का सृजन नहीं हो सकता. यह आज भी उतना ही सच है. लेकिन इस सच को झुठलाने के लिए तरह–तरह की साजिशे वर्तमान सत्ता द्वारा हो रही है और मेहनत जिसके जीवन का आधार है, उसकी सुविधाओं और अधिकारों में बराबर कटौती होती जा रही है. सबसे दुःख की बात है की इस साजिशों को तार-तार करने की जवाबदेही, जिन राजनैतिक जमातों ने अपना प्राथमिक बना रखा था, वे काफी कमजोर और प्रभावहीन हो चुके हैं. परन्तु इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि इनके पास संसद से लेकर सड़क तक संघर्ष का गौरवशाली अनुभव और विरासत है. लेकिन इनकी राजनैतिक शुचिता के अहं ने इनके आधार को और भी सीमित कर दिया है. परिणामत: इनके नेतृत्व के प्रति विश्वसनीयता में निरंतर ह्रास होता जा रहा है. जबकि उनकी जरूरत आज पहले की अपेक्षा काफी बढ़ चुकी है. इसे हम इस तरह से समझ सकते हैं कि आज अमीरी-गरीबी की खाई पहले की अपेक्षा अधिक भयावह है, पिछले २५० सालों के गौरवशाली संघर्ष से प्राप्त अधिकारों और सुविधाओं से मजदूर और अन्य कामगारों को को अलग कर दिया जा रहा है, कारपोरेट घरानों का हमारे जीवन के हर पहलू पर निरंतर कब्जा बढ़ता जा रहा है. ऐसे में इन जमातों का कर्त्तव्य था कि वर्तमान समय की साजिशों को जनता के समक्ष उजागर किया जाता. वे तो अपने अस्तित्व को बचाने में भी सक्षम नहीं नहीं हो पा रहे हैं. परंतु वे वर्तमान समय की सच्चाई को स्वीकार कर विकल्प तलाशने के बजाय बराबर उसी ढांचे में मजबूत बनने की कोशिश कर रहे हैं, जो उन्हें और भी कमजोर कर दे रहा है.
वर्तमान समय की विकृतियों को लेकर कई एनजीओ और जनसंगठन अपना काम कर रहे है चाहे वह जमीन पर वर्तमान समय की विकृतियों को लेकर जमीन पर कारपोरेट घरानों के कब्जे को लेकर हो या फिर औधोगिक विकृतियों और श्रम कानूनों में हो रहें संशोधन में हो रहे संशोधन के खिलाफ. परंतु राजनैतिक चेतना और संघर्ष के विरासत की स्पष्ट समझ के अभाव में वे तात्कालिक कारणों तक सीमित रह जा रहें हैं और समस्या की मूल जड़ निरंतर मजबूत होती जा रही है. कुछ लोगों का तो यह भी भ्रम है कि राजनैतिक कार्यों में आये खालीपन को हम अपने सामाजिक कार्यों से भर देंगे और दुखित और दमित जनता की मुक्ति के सपने को साकार कर देंगे. लेकिन अब तक के अनुभव यह साबित करते हैं कि राजनैतिक साजिशों का जवाब राजनैतिक कार्रवाई ही दे सकती है. अगर हम इस खालीपन को सामाजिक आन्दोलन के माध्यम से भरने की कोशिश करेंगे, तो वह कहीं न कहीं पूंजीवादी राजनीति और अर्थशास्त्र को मजबूत करेगा. वही वर्तमान सत्ता द्वारा इन एनजीओ के काम करने के अवसर को कम कर दे रहा है. ऐसे में हमें सोचना पड़ेगा कि हम बहुत ही संकट के दौर में जी रहें हैं, जहाँ शोषित- पीड़ित समुदाय को अलग-अलग खाचों में बाँटने की परिस्थितियां राजसत्ता खड़ी है. यहाँ तक संविधान द्वारा बनाये गये राज्य व केंद्र के शक्तियों और अधिकारों के साथ भी छेड़-छाड़ जारी है. सामाजिक और सांस्कृतिक तानेबाने को छिन्न-भिन्न कर ऐसा इंसान सृजित किया जा रहा है, जो उन्माद और क्रूरता से भरा हो. इसके कई उदहारण हमें देखने को मिल रहा है.
दोनों को अपनी-अपनी सीमा और कमजोरी को समझना होगा. इसके बाद ही कोई रास्ता निकल सकता है. आज ज्यादा जरुरी है कि दोनों जमात अपने –अपने दायित्व का निर्वाह करे. क्योंकि दोनों के अस्तित्व को वर्तमान राजसत्ता नष्ट करने पर लगी है. हमले काफी भयावह है. अगर अपने-अपने अहम् के कारण दोनों सचेत नहीं हुए, तो इतिहास इन्हें माफ़ नहीं करेगा. आज जरुरी है कि सामाजिक आन्दोलन और राजनैतिक आंदोलन साथ-साथ परस्पर सहयोग और निर्भरता से एक ऐसी दुनिया का सपना गढ़े, जो क्रूरता और उन्माद का अंत कर विवेकशील इंसान को रहने लायक हो.

झरिया, झारखण्ड में १०० सालो से चल रही कोयले की खदान से ज़मीन के नीचे आग लगती है जिन्हें काबू में लाना मुश्किल ही नहीं बल्...
03/12/2015

झरिया, झारखण्ड में १०० सालो से चल रही कोयले की खदान से ज़मीन के नीचे आग लगती है जिन्हें काबू में लाना मुश्किल ही नहीं बल्कि नामुमकिन है. झरिया की यह कुछ तसवीरें दुनिया के सामने कोयला खनन के दुष्परिणाम दर्शाती है.

As all eyes look to Indian Prime Minister Narendra Modi at climate talks in Paris this week, underground fires rage below open cast mines in Jharia, a remote region in eastern India. The incessant mining and the underground fire that has been burning for almost a century has contaminated everything:…

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