11/11/2023
जबसे आये शहर को , छोड़ ' हम गाँव।
फिर न मिली हमको कभी,अपनेपन की छांँव।।
जीवन कर्कश हो गया, ज्यों कौवे की काँव।
कोयल भी ना बोलती ,बैठ नीम की छाँव।।
चूल्हा जलता देखकर, लग आती थी भूख।
अम्मा कहती नहा आ, हम जाते थे सूख।।
संझा के झुटपुटे में , सजती थी चौपाल।
पिता नंद माँ यशोदा , लड़के थे गोपाल।।
छत-आँगन में सांँझ ही, पड़ जाती थीं खाट।
दादी से सुनने कथा , रोज़ जोहते बाट।।
चौपाये भी थे कभी , परिवारों के अंग।
टूट गये परिवार भी , छूट गया वह संग।।
दूध - दही सब मुफ्त में मिलता था भरपूर।
अब तो पानी बिक रहा ,लेने को मज़बूर।।
निपट गरीबी में सभी , खुशियाँ लेते छाँट।
आपस में सुख-दु:ख सभी,मिल लेते थे बाँट।।
शहरों ने अब गाँव का , गला दिया है घोट।
सब कुछ खोकर क्या मिला,चंद कागज़ी नोट।।
महुआ बरगद आम के , पेड़ रहे हैं टेर।
अब तो वापस लौट आ , बहुत हो गयी देर।।