05/09/2022
पुस्तक का नाम- देवालिका
प्रकाशक- राजमंगल प्रकाशन
लेखक- लक्ष्मीकान्त शुक्ल
कुल पन्नें - 341
मुल्य- 350
रेटिंग - 9.5/10
समीक्षा- संजय
कोई भी कहानीकार जन्म से लेखक नहीं बनता। तो लेखक कैसे बनता हैं? एक साधारण मनुष्य अपने आसपास कि घटनाओं या इतिहास के ऐतिहासिक घटनाओं का मंथन करते-करते कब उसके अंदर एक मनोवैज्ञानिक प्रहार होता हैं कि खुद समझ नहीं पाता और एक अलग कल्पना कि दुनियां में खोता चला जाता हैं, और यहीं से वह लेखक बनने के सफर में आ जाता हैं। महर्षि वेदव्यास ने महाभारत लिखी उस महाभारत को पढ़कर या देखकर ना जाने कितने आधुनिक लेखक बने, यानी वेदव्यास के महाभारत ने अनेक आधुनिक वेदव्यास को जन्म दिया।
ज्यादा वक्त ना गंवाते हुए मेन पोइंट में आता हुं तो आज हम बात करेंगे 'लक्ष्मीकान्त शुक्ल' लिखित उपन्यास 'देवालिका' के बारे में, इससे पहले थोड़ा लेखक के बारे में बात कर लेते हैं। लक्ष्मीकान्त शुक्ल उत्तर प्रदेश के कानपुर के रहने वाले हैं और विभिन्न साहित्यिक गतिविधियों पर कवि और वक्ता के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराते रहें हैं, और उत्तर प्रदेश सरकार में सेवारत हैं, जब राज्य सरकार कि लाठी काम कराने के लिए कर्मचारियों पर पड़ती है तो अपने दोनों हाथों को काम में लगा देते हैं यानी इन्हें दोनो हाथों से लिखने का हुनर हैं।
'द आवाज़ मिडिया' के दफ्तर में लक्ष्मण जिसे बाॅस ने परशुराम के विषय में जांच परताल का आदेश देता हैं। लक्ष्मण अपनी प्रेमिका रिपोर्टर के साथ चल देता हैं परशुराम के खोज में महेंद्रगिरी के पर्वत। पर्वत के एक खंडहर में एक ताबुत में मिलता हैं, हजारों वर्ष पुरानी विलक्षण काया वाली सुंदर औरत कि डेड बॉडी जो किसी रसायन से अभी भी सुरक्षित थी और साथ में भोजपत्र में संस्कृत में लिखी गई पुस्तक। फिर शुरू होता हैं देवालिका कि त्रिकोणीय प्रेम कहानी। देवालिका शेशालय राज्य कि राजकुमारी अपने दासियों के साथ निर्वस्त्र होकर देवालय के तालाब में नहाने जाती हैं, उसके सुंदर काया देवालय के पेड़ पर बैठे वानर को इसकदर मोह लेता हैं जैसे वानर इस काया को और देखना चाह रहा हों, अपने देखने की इच्छा को पुरा करने के लिए वानर ने राजकुमारी का वस्त्र चुरा लेता हैं यह देख राजकुमारी चिल्लाई राजकुमारी के आदेश से सारे सैनिक जो देवालय से बाहर राजकुमारी के सुरक्षा के लिए तैनात थे वानर को पकड़ने और उससे वस्त्र वापस लेने के लिए उसके पीछे दौड़े, पर वानर तो वानर हैं। फिर एंट्री होता है काशी राज्य के राजकुमार धनुधरी धनंजय कि और वानर से वस्त्र लेकर सैनिकों को वापस देता हैं। राजकुमारी यह सुनकर खुश होता है और शुरू होता है दोनों कि लव स्टोरी जो आधुनिक लव स्टोरी से बेहतर हैं। प्यार परवान चढ़ता है, परवान चढ़ने का मतलब आपलोग समझते होंगे।
चैत्रक जो देवालिया का मामा हैं और मगध के वीर योद्धा दुर्जय का मित्र, चैत्रक शेशालय का राजा बनना चाहता हैं और अपने स्वार्थ के लिए अपने मित्र दुर्जय से विवाह करवाना चाहता हैं, दुर्जय महान योद्धा के साथ-साथ सबसे शक्तिशाली राज्य भी हैं। चैत्रक दुर्जय को देवालिया के कुछ दैविये शक्तियों के बारे में को बताता हैं जिसके कारण शादिशुदा दुर्जय देवालिका के शक्तियों को पाने के लिए राजी हो जाता है और शेशालय राज्य के राजा को अपने पुत्री का विवाह दुर्जय से कराने के लिए मगध के महाराजा दुर्भिक के द्वारा शेशालय के महाराज को नंदसेन को पत्र भेजता हैं पर नंदसेन अस्वीकार कर देता हैं, अपने अपमान का बदला लेने के लिए दुर्भिक और नंदसेन के मध्य युद्ध होता है और दुर्भिक वीरगति को प्राप्त होता हैं। नंदसेन देवालिका का स्वंवर कराता हैं जिसका विजेता अमृत होता हैं पर उसने अपने मित्र दुर्जय के लिए स्वंवर में भाग लिया इसलिए इसे अमृत का जीत स्वीकार नहीं होता। दुसरा विजेता धनंजय होता है पर दुर्जय देवालिका को स्वंवर से ले भागता है। नंदसेन को भी दुर्जय मौत के घाट उतार देता हैं। अमृत धनंजय को कुछ करने से पहले ही रोक लेता हैं क्योंकि अमृत को युद्ध में हराना नामुमकिन हैं। फिर शुरू होता है एक दूसरा महाभारत। धनुर्विद्या के सारे वाणों के नाम इस महाभारत में मौजूद हैं जो वेदव्यास ने अपने महाभारत में लिखना भूल गये थे। दुर्जय के द्वारा अपने प्रेमिका को भरे स्वंवर में लूट कर ले जाने का अपमान और अमृत के वानों का सामना करने के लिए धनंजय परशुराम से धनुर्विद्या सिखने के उद्देश्य से महेंद्रगिरी के लिए रवाना होते हैं पर उसे मिलता है माधव। माधव जो दुर्जय का सबसे बड़ा दुश्मन है और दुश्मन का दुश्मन मित्र होता हैं। फिर महाभारत से भी भंयंकर युद्ध होता है काली घाटी खून की नदियों से बहने लगती हैं, एक के बाद एक योद्धा वीरगति को प्राप्त होता हैं। अमृत का पुत्र जो युद्ध में भाग नहीं लिया माधव और भव्य जो धनंजय का भाई था छल से उसका धर शरीर से अलग कर देता हैं, फिर छल से अमृत और राम भक्त इंद्रजित को धनंजय के द्वारा माधव के आदेश से मौत के घाट उतारना सच में असहनीय दर्द है। दुर्जय के किस चाल से धनंजय का अंत होता हैं, माधव आखिर क्यों धनंजय का साथ दिया? माधव का उद्देश्य क्या था? देवालिया का लास सैकड़ों साल बाद भी सुरक्षित क्यों है? किसने उसे सुरक्षित रखा यह जानने के लिए पढ़ें 'देवालिका'
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“छोड़ जाते हो तुम जब भी मुझे... मेरे हृदय को चुभता है। ‘...